मेरी अलवर, भानगढ़ यात्रा दिसम्बर 2013

यूं तो घूमने जाने के लिए में हमेशा से बेकरार रहता हूं ,बहुत सी जगह घुमा किन्तु कोई लेख अभी तक नही लिख पाया ,हां डायरी में कुछ जानकारियां अवश्य लिख लेता था ,
ये पहली यात्रा तो नही किन्तु लेख पहला है कोशिश करता हु ,ओर हां एक बात बताना बिल्कुल भूल रहा था कि , लेख लिखने की प्रेरणा भाई नीरज जी से मिली काफी लेख पढ़े इनके घूमने का तरीका भी समझ आया , कोशिश रहेगी कि आगे कभी पुख्ता घुम्मककडी की जाएगी । 
हां तो में यह बता रहा था कि लेख पहला है सो भावनाओ को समझें 
में पेशे से संगीत शिक्षक हु में ओर मेरी पत्नी मानसी हम दोनों बच्चों को कत्थक नृत्य गायन वादन पढ़ाते ओर सिखाते है इसी तारतम्य में बड़े नृत्य महोत्सव आदी में आप सभी के आशीर्वाद ओर बच्चों की मेहनत से आमंत्रित किया जाता है , 2013 में न न करते करते भी हम भारत के वरिष्ठ कलाकार आदरणीय गिर्राज जैमिनी जी के आग्रह को नही ठुकरा पाए और अक्टूबर माह में निकल पड़े अलवर की ओर कार्यक्रम हुआ बच्चों को सभी के आशीर्वाद से सीनियर ओपन श्रेणी में प्रथम पुरस्कार समूह लोकनृत्य में ओर एकल कथक में जूनियर वर्ग में भी प्राप्त हुआ , अब मुख्य बहाना कार्यक्रम में जाने का जो रहता है वह है नए नए क्षेत्र घूमना मुझे जितने हिमाचल के पहाड़ पसंद है उतना ही लगाव महलों के खंडहरों से भी पता नही क्यों एकांत में खंडहर हो चुके महलों हवेलियों की ओर बरबस खींचा चला जाता हूं , सो वहां पता लगाया गया कि यहां देखने लायक क्या क्या है , जानकारी प्राप्त हुई की सिटी पैलेस,मूसी रानी छत्री , म्युजियम ओर पहाड़ पर बाला किला है इसे अलवर किला भी कहते है ।
जहां हम रुके थे वहां एक चाय वाले भैया है जाते उन्होंने  उस महल के पिछले हिस्से में न जाने की हिदायत दे दी थी , फिर क्या था सारे रास्ते भर उस पिछले हिस्से की ही सोचकर समय कटा , 
 साथ मे ग्रुप की बच्चियां सभी ने कहा पैदल चलेंगे सो चल दिये पैदल वो तो रात को समझ मे आया सभी के, की, 12 किलोमीटर ऊपर पहाड़ पर चढ़ना ओर वापस आना क्या होता है । खैर रास्ते मे मोर बहुत संख्या में मिले हिरन नीलगाय सांभर आदी बच्चों का खूब मनोरंजन हुआ ।
जैसे तैसे पहुच गए 
बाला किला जिसे अलवर किले के नाम से भी जाना जाता है, अलवर शहर में एक पहाड़ी पर स्थित है।यहां से पूरे अलवर शहर को देखा जा सकता है । इस किले का निर्माण ईसा पश्चात वर्ष 1550 में हसन खान मेवाती ने करवाया था। यह स्मारक अपने चिनाई के माक और भव्य संरचनात्मक डिज़ाइन के लिए प्रसिद्द है।    यहाँ छह प्रमुख द्वार हैं जो इस प्रकार हैं, जय पोल, लक्ष्मण पोल, सूरत पोल, चाँद पोल, अंधेरी द्वार और कृष्णा द्वार जो किले की ओर जाते हैं। किले की संपूर्ण संरचना उत्तर से दक्षिण की ओर 5 किलोमीटर और पूर्व से पश्चिम की ओर 2 किलोमीटर तक फ़ैली हुई है।
जानकारी मात्र मिली बाकी अंदर प्रवेश के लिए वहां के सुरक्षा कर्मियों ने मना कर दिया परकोटे में ही घूम कर फोटो ले सकते है इस पर बस राजी हुए 
नीचे एसपी कार्यालय से परमिशन बनवाकर लाना था और हम ने अपने आयोजको को बगेर बताए आ गए थे अन्यथा वे व्यवस्था करवा देते , फोटो खिचवाक़र वहां से किले की पीछे की ओर निकल पड़े मन मे चाय वाले कि बात की की,"मत जाना "पर मन नही माना और टूटी हुई सीढ़ियों के सहारे हम पहुच गए किले के पीछे हिस्से पर लगा वर्षो से बन्द है दरवाजे को हिलाया डुलाया कोशिश की तो खुल गया अंदर पैर रखते ही घुटने तक  चमकादड़ की लीद में घुस गए सूखी होने से गन्दा ज्यादा नही हुआ , बच्चे भी निडर वे भी घुस पड़े अंदर जाकर पता लगा कि पिछले हिस्से में रिपेरिंग चल रही है फटाफट फोटो निकाली गई और उसी रास्ते से वापस , घटना तो घटी पीछे आ रही ग्रुप की बड़ी लड़कियों ने स्पस्ट आवाज सुनी की राजस्थानी बोली में कोई महिला उन्हें वहां बुला रही है और बैठने को कह रही है , बच्चे तेजी से वहां से निकल कर बाहर आये तब मुझे बताया , मेने उन्हें मन का वहम कह कर शांत किया वापसी में हनुमान जी का मंदिर में दर्शन कर 
सिटी पैलेस आ गए लगभग 4 बज रहे थे सिटी पैलेस का निर्माण 1793 में राजा बख्तावर सिंह ने कराया था सुबह और शाम को सूर्य की चमकीली किरणे इस महल को रोशनी से भर देती है , इस महल में म्यूजियम भी है
जहां उस समय की वस्तुएं ओर हथियार आदी रखी हैं । शुक्रवार को बन्द रहता है और रोज शाम 5 बजे बाकी दिनों में बन्द होता है , पीछे झील है जिसे सागर कहा जाता है , वही मूसी रानी की छत्री है मूसी रानी राजा बख्तावर सिंह की पत्नी थी जो बाद में पति के साथ सती हो गई थी शाम हो गई थी बच्चे तक भी गए थे ,दूसरे दिन भानगढ़ जाने का प्लान बनाते हुए सो गए । 
भानगढ़ यात्रा अगले अंक में

रविंद मन्द्रेला                                   अलवर किला 

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