मेरी अलवर, भानगढ़ यात्रा भाग 2
मेरी अलवर भानगढ़ यात्रा भाग - 2
पिछले लेख में अलवर यात्रा के दौरान बाला किला, सिटी पैलेस,म्यूजियम,मूसी रानी की छत्री घूम चुके थे, रात को ही एक सूमो वाले से बात कर ली थी सो सभी सुबह जल्दी उठ गए स्नान ध्यान के पश्च्यात नास्ता किया और निकल पड़े ,हमे ज्यादा कुछ पता नही था सो हमने अपने ड्राइवर को ही बोल दिया कि ,
भाई शाम तक का समय है जो भी देखने लायक जगह है दिखा दो , बात करते करते शहर से बाहर निकले बच्चे गाड़ी के अंदर काफी मस्ती कर रहे थे , मेने भी नही रोका ,क्योंकि बच्चे शांत भी तो अच्छे नही लगते ओर हमारी श्रीमती जी उनकी शिक्षक जरूर है पर ऐसे मिल जाती है बच्चों से की कोई देखेगा तो विद्यार्थी ही समझेगा
कुछ देर चलने के बाद ड्राइवर ने बताया कि ,सिलीसेढ़ झील के विषय मे यह प्राकृतिक झील है जो बहुत मनमोहक है अलवर से मात्र 16 किलामीटर की दूरी पर यह झील वाकई सुंदर पिकनिक स्पॉट है जहां पूरा दिन बिताया जा सकता है किंतु यह सब बातें समझ आई हमे शाम को ,क्योंकि जाते समय तो हमने समय के आभाव में पहले भानगढ़ जल्द पहुचने की बात कही ,शाम को लेट हो गए बोटिंग भी बन्द हो गई थी फोटो खींचने की कोशिश की गई किन्तु साफ नही आई ,
खेर हमारे ड्राइवर ने एक ओर सुंदर से नहर जैसे स्पॉट पर गाड़ी रोक दी बच्चों को फोटो आदी लेने के लिए वह भी सुंदर स्थान था नाम हम अब भूल चुके है हां वहां बन्दर बहुत संख्या में थे परंतु किसी को भी परेशान नही करते । कुछ समय रुककर वहां से आगे बढ़े अब यहां से सरिस्का नेशनल पार्क का एरिया लगता है अद्भुत सुंदर मार्ग बारह सिंघा ,सांभर रास्ते मे दिख रहे थे , हमने भी कहा कि भाई जंगल मे रुपये देकर भी यही देखना है तो इसका फायदा क्यों न उठाया जाए एक जानकारी हमे अलवर में ही लग गई थी कि सरिस्का में अब शेर नही दिखते बाहर से लाये है पर पर्यटकों को अन्य जानवरों के दर्शन ही हो पाते है ,उस कारण हम पार्क नही गए थे ,ओर वही आनंद यहां मिल रहा था तो
बच्चों ने जम के फोटोग्राफी की लोकेशन भी सुंदर और जंगल के जानवर भी मजा दोगुना हो गया थोड़ा देर रुकने के बाद धीरे धीरे गाड़ी चली ।इन धीरे चलाने का कारण पूछा तो यहां का नियम है स्पीड कम रखने का है जस्नवर सड़क पर आ सकते है ,इस कारण , आगे सुंदर नजारे ओर अरावली पर्वत श्रंखलाओ के नजारे देखते हुए ड्राइवर ने मुख्य मार्ग से हटकर गाड़ी डाल दी पूछने पर बताया कि एक सिद्ध स्थान है , वैसे तो में बाबा आदि पर विश्वास नही करता किन्तु बाहरी क्षेत्र में देखने लायक अथवा कोई प्रशिद्ध स्थान है तो देखना जरूर चाहता हु ,अतः हां कह दिया जो स्थान पहुचे वाकई बहुत ही सुंदर आश्रम था अजीब सी शांति थी ,स्थान था भृतरी आश्रम ,गोरखनाथ सम्प्रदाय के साधु वहां की सेवा करते है एक धूनी वहां थी । कुछ देर वहां रुके बहुत अच्छा लगा । आश्रम की कहानी ऐसी है कि राजा भृतरी उज्जैन के राजा थे एक बार गुरु गोरखनाथ ने उन्हें देखा तो उन्हें लगा कि ये राजा तो वैरागी है किंतु अभी मोह जाल में फंसा है , सो उन्होंने राजा को एक फल दिया और कहा कि यह अमर फल है इसे खाने से व्यक्ति बूढ़ा नही होता अमरत्व प्राप्त कर लेता है , राजा की 2 रानियां थी किन्तु उसने पिंगला नाम की रूपवती ओर कम उम्र की रानी से विवाह किया वो उसे बहुत चाहता था उसने वह फल अपनी रानी पिंगला को दे दिया , रानी सेनापति पर मोहित थी उसने वह फल सेनापति को दे दिया , सेनापति एक वेश्या पर मोहित था उसने वह फल वेश्या को दे दिया , जब वेश्या फल खाने को हुई तब उसे विचार आया कि यह जिंदगी नरक सी है जितनी जल्दी खत्म हो जाये मुक्ति मिलेगी अगर यह फल खाया तो इस जीवन से कभी मुक्त नही हो पाएगी , इस कि जरूरत राजा को हे राजा न्याय प्रिय है जन हितेषी है राजा जियेगा तो प्रजा का हित होगा देश सुरक्षित होगा सो वह फल उसने राजा को दे दिया । राजा ने उस फल को पहचान लिया सारी बात पता लगने पर सेना पति को देश निकाला दे दिया राजा को मोह माया से मुक्ति मिल गई उसने वैराग्य धारण किया गोरखनाथ जी को गुरु बनाकर सन्त बन गए यह आश्रम उन्ही राजा भृतरी का है
,आश्रम से निकल कर कुछ देर चलने के बाद हम एक ओर पवित्र स्थान पर रुके वो था माता नारायणी मंदिर यह मंदिर बहुत प्रशिद्ध है आसपास पहाड़ियों से घिरे मंदिर की छटा मनमोहक थी नारायणी माता के दर्शन किये पुजारी जी ने कुंड के दर्शन करने को कहा ,मंदिर के सामने कुंड है कुंड में उस समय ज्यादा पानी तो नही था किंतु किनारे में एक जगह से पानी की धार अनवरत निकल रही है , उस समय पानी गर्म निकल रहा था , कहते है कि इस पवित्र धारा से ठंड में गर्म और गर्मी में ठंडे पानी की धार अनवरत निकलते रहती है ,पुनः एक बार नारायणी माता को प्रणाम कर सभी ने चाय नास्ता कर आगे बढ़ गए । अब हमारा अगला ठिकाना सीधे भानगढ़ था जैसे जैसे हम भानगढ़ के नजदीक पहुचते जा रहे थे वैसे वैसे देखने की उत्तेजना बढ़ रही थी , कहानियों में जितना सुना सजीव खुद से देखने की उत्सुकता अलग ही होती है ,बच्चे भी भूतों की बात कर मजे ले रहे थे , वहां पहुचते पहुचते थोड़ी गर्मी सी लगने लगी थी करीब डेढ़ बजे रहे होंगे जब वहां पहुंचे।
बच्चों ने ,ओर हमने भी खाने पीने की वस्तुएं अलवर से ही लेकर चले थे तो किला घूमने से पहले सबने पेट पूजा का प्लान बनाया , में मना भी नही कर सका क्योंकि मुझे भी भूख लग रही थी , तो भाई सबसे पहले हमने पेट पूजा की , उसके बाद ड्राइवर को घूमकर आने के बाद फोन लगाने को बोल कर चल दिये उस रहस्यमयी किले की ओर
लगभग एक से डेढ़ किलोमीटर पूरा नगर हवेलियां घर, दुकाने, बाजार ,किन्तु सब वीराना , सारे के सारे खंडहर , घबराहट के साथ उत्सुकता भी की, एक साथ ऐसा कैसे हो सकता है जैसे भूकम्प आया हो और वह पूरा शहर खंडहर में बदल गया , लोग खत्म हो गए कोई बचा नही बताने वाला की, हुआ क्या था ?
नगर देखते देखते पहुच गए किले के मेन गेट पर जहां सामने लगा वो पेड़ जो सीरियल में दिखाया जा चुका है बहुत ही भयानक दिखाई देता है , या फिर हमारी मानसिकता जो वहां जाकर ऐसी बन गई थी कि हर चीज हमे भूतिया ही दिखाई पड़ रही थी , खेर हमने फोटो ग्राफी शुरू कर दी थी अंदर पहुचने पर दाहिने हाथ मे गोपीनाथ मंदिर दिखाई दिया आश्चर्य हुआ कि ये भी उसी समय का है पर इस मंदिर को कुछ नही हुआ ? मंदिर की वास्तु ओर कारीगरी देखते ही बनती है , अब बच्चे करने लगे परेशान की पहले कहानी बताइए कि ये महल किसका था और ये सब कैसे हुआ ,
वही मंदिर में बैठ कथा शुरू हुई जितना हमने पता किया था वही उन्हें भी बताया की,
इस किले का निर्माण आमेर के राजा भगवानदास ने कराया था। "भानगढ़" राजा मानसिंह के भाई माधोसिंह की राजधानी रहा। मानसिंह को अकबर का बहुत करीबी माना जाता था। भानगढ़ से पांच किलोमीटर दूर है सोमसागर तालाब, जिसके किनारे से एक पत्थर मिला था। इस पत्थर से पता चला था कि माधो सिंह अकबर के दरबार में दीवान थे। सोमेश्वर मंदिर और गोपीनाथ मंदिर सुरक्षित है और इनकी नक्काशियां बहुत अच्छी है किले के खंडहर में बदलने की बहुत सी कहानियां है कॉमन कहानी
के अनुसार एक दुष्ट जादूगर ने श्राप दिया था जिसके कारण यहां सब खत्म हो गया।
ऐसा कहा जाता है कि भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती बहुत सुंदर थी और इसी सुंदरता पर एक तांत्रिक भी फिदा था। जिस दूकान से राजकुमारी के लिए इत्र जाता था, वह उस दूकान में गया और उस बोतल पर जादू कर दिया जो राजकुमारी के लिए भेजी जाने वाली थी। राजकुमारी को बोतल मिली तो सही लेकिन एक पत्थर पर गिरकर टूट गई। कही कहि ऐसा लेख मिलता है कि, राजकुमारी को उसकी सहेली से ज्ञात हुआ कि जादूगर ने ऐसा जादू किया था कि इत्र लगाने वाला उसे (जादूगर को) प्यार करने लगे।तो राजकुमारी ने पत्थर पर इत्र की बोतल पटक कर तोड़ दी थी , अब इत्र पत्थर को लगा था तो पत्थर ही जादूगर से प्यार में मोहित होकर उसकी ओर चल पड़ा। पत्थर ने जादूगर को कुचल दिया लेकिन मरने से पहले उसने भानगढ़ की बर्बादी का श्राप दे दिया। कुछ कहानियां कहती है कि अचानक उसी रात सारे लोग मर गए मकान महल सब खंडहर हो गए कुछ कहते है कि , कुछ वक्त के बाद एक युद्ध हुआ जिसमें भानगढ़ ओर अजबगढ़ में युद्ध हुआ और दोनों तबाह हो गये और यहां रहने वाले सभी लोग मारे गए।,कुछ कहानी ऐसी की यह आकाल पड़ा पानी की कमी के कारण लोग मरने लगे पूरा शहर आकाल से मर गया मकान महल धीरे धीरे खंडहर में बदल गए ,
किन्तु कुछ तो कारण होगा कि इतने वर्षों के बाद भी यह स्थान नही बस पाया ? खेर बच्चों से मन का डर निकाल कर किला घूमने को कहा अकेले कोई नही जाएगा इतना ध्यान रखना जो चीज छूने को मना लिखा हो न छूना ,
बच्चे तो बच्चे ही है ऐसी ऐसी जगह जड़े होकर फोटो खिंचवाई गई है कि जहां बड़े भी डरें , महल अब दो मंजिल का बचा है , कहा जाता है कि पहले 7 मंजिल का हुआ करता था ,नीचे से ऊपर तक खंडहर ही खंडहर ,कुछ जगह कमरे दिखाई देते है पर वो भी टूट गए है महल को 7 मंजिल का महसूस करो तो राजस्थान की भव्यता सोच मन प्रफुल्लित हो जाता है कि जब खंडहर ऐसे है तो वास्तविक महल कैसा रहा होगा , सामने बहुत बड़ा मैदान जिसमे दूब लगी हुई है जहां लोग बेठ कर नजारे देखते है बच्चे खेलते है , ठीक सामने ही सोमेश्वर मंदिर उसके सामने बावली है , वहां नजदीक जाने को मना लिखा था पानी बिल्कुल काला पड़ गया जैसे वर्षो से सफाई नही हुई मंदिरों की नक्काशी बहुत सुंदर है ।
पूरा किला घूम लिया किन्तु कहि पर भी ऐसा नही लगा कि कुछ गड़बड़ है , हा कुछ जगह मुझे काफी निगेटिविटी महसूस हुई एक जब में बावली के पास खड़ा था और जब महल के ऊपरी हिस्से में अकेला खड़ा फोटो खींच रहा था , बाकी ऐसा कुछ समझ नही आया , वहां 6 बजे के बाद किसी को भी रुकने की अनुमति नही है ,काफी डाक्यूमेंट्री बन चुकी है भानगढ़ पर वाकई देखने लायक जगह है अगर आपको महलों ओर खंडहरों से लगाव है तो , अगर नही तो फिर आपके देखने लायक कुछ नही , मेने पहले भी कहा की मुझे जितना अच्छा हिमाचल के पहाड़ देखना बर्फवारी देखना लगता है उतना ही महलों प्राचीन स्मारक खंडहर , भी एक अजीब सा खिंचाव महसूस होता है ,उन महलों की भव्यता को महसूस करो तो उस दौर में कुछ पल जीने का अहसास होता है ,
लगभग 4 बजे तक वही रहे फिर वापस लौट चले रास्ते मे अजबगढ़ दिखाया जो उसी समय से खंडहर है किंतु अब कुछ लोग वहां रहने लगे है अजबगढ़ से एक किलोमीटर दूरी पर बसाहट होने लगी , रास्ता उतना ठीक नही था इस कारण समय लग रहा था बच्चे भी थक गए थे , जैसे तैसे झील पहुचे शाम हो चुकी थी ,मन मार कर एक दो फोटो तो सबूत के तौर पर लाजमी है सो दस्तूर निभाया गया ठंड गजब बढ़ गई थी लगभग 7 बजे तक वापस अपने ठिकाने में आ गए मुह हाथ धोकर फिर निकल पड़े कुछ देर कार्यक्रम में पहुचे अपना इनाम प्राप्त किया ,कार्यक्रम में प्रस्तुति के समय की एक बात याद रहेगी कि वहां के विधायक श्री बनवारी लाल जी ने कहा था कि एम.पी. के बच्चे राजस्थान में आकर हमे हमारे ही लोकनृत्य घूमर की ऐसी प्रस्तुति दिखाई ,दिल खुश हो गया ऐसा सुंदर घूमर हमने भी न देखा सर पर एकसौ आठ दीपक का लोहे का रिंग रख कर नृत्य बहुत ही सुंदर था , बड़ी खुशी हुई थी जब उन्होंने मंच पर आकर सभी बच्चों के साथ फोटो खिंचवाई ओर सभी को आशीर्वाद दिया था । अपने मोमेंटो को लेकर बच्चे बाजार का रुख कर गए ,
अलवर में बाजार जल्द बन्द हो जाते है
लौट कर खाना खाया और अपने कमरों बेग पैक करने की तैयारी , अलवर में ठंड भी बहुत पड़ती है ये उस समय पता लगा अब सुबह वापस सिवनी के लिए निकलना भी था ,सभी ने सुबह की तैयारी कर रखी । सुबह बस से मथुरा क्योंकि आते समय ट्रेन से आये थे बहुत समय लग गया था सो मथुरा स्टेशन फिर छत्तीसगढ़ पकड़कर छिंदवाड़ा फिर वहां से बस से सिवनी ।
अब बस इतना ही , आगे फिर मिलेंगे
भानगढ़ का रहस्यमयी किला
नटनी का बारां
सरिस्का नेशनल पार्क के रास्ते
राजा भर्तरी आश्रम
भानगढ़ नगर के खंडहर
गोपीनाथ मंदिर
सोमेश्वर मंदिर
सिली सेड झील
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