वैष्णो देवी-शिमला,दिल्ली,वृंदावन,यात्रा भाग -3

पिछले अंक में आपको बताया था कि हम शिमला से छोटी लाइन ट्रेन में बैठ कर कालका तक ओर वहां से आज 31 दिसम्बर 2001सुबह 06 बजे  दिल्ली पहुचे है , ठंड तो कड़ाके की है और दिल्ली में कोहरा बहुत होता है हमने समय का महत्व समझते हुए , स्टेशन में ही नित्य कर्म से  फारिग होकर लॉकर रूम में अपना सामान रखा और निकल पड़े दिल्ली दर्शन को सबसे पहले हम पहुचे  लाल किला उस समय सोमवार को बन्द हुआ करता था तो हमने बाहर से ही दर्शन किये कुछ तस्वीरें लीं , तस्वीरों के मामले में मेरी किस्मत बहुत खराब है सबकी फोटू अच्छी आ जाती है ओर मेरी जो भी खींचता है , बस कैमरा क्लिक बस करता है , खैर ये तो चलता ही रहेगा हम आगे चलते हुए राजघाट पहुचे वहां महात्मा गांधी की समाधि देखी , यहां इंदिरा गांधी , राजीव गांधी , ओर संजय गांधी की भी समाधि है , संजय गांधी की समाधि के पास में गंदगी फैली थी लगता है उपेक्षित है , वहां एक अंग्रेज लड़की का कैमरा रह गया था जो मेने उठाया और काफी देर ढूंढते रहे बाद में एक गाइड ओर वो लड़की आई उसने कैमरा लिया धन्यवाद बोलकर हमारे साथ खुद के कैमरे से फोटो खींची ओर चले गए , यहां लगभग 2 घण्टे गुजारने के बाद , बस से इंडिया गेट पहुचे  ,यहां  परेड की तैयारियां चल रही है घूमते घूमते राष्ट्रपति भवन गए किन्तु सुरक्षा की दृस्टि से अभी अंदर प्रवेश निषेध है , सब बाहर से ही निहार रहे थे हमने भी वही किया , संसद भवन भी वही है , यहां अंदर जाने के लिए किसी सांसद अथवा मंत्री से लिखवाकर लाना होता है , हमने यह सोचा ही नही था इसलिए मन मे कोई मलाल नही  , अभी कुछ समय पहले आतंकवादी यही घुस गए थे इस कारण सुरक्षा व्यवस्था बहुत कड़ी है , बस से आगे लाल किला जा रहे थे कि, जाम लग गया , हम वही उतरे और एक गली में चले तो सामने देखा जामा मस्जिद है हम  फिर जामा मस्जिद गए वहां अंदर जाने पर नाटक ज्यादा है , जूते अपने हाथ मे रखो , उन्हें चिपकाकर रखो , मेने तो भजन सुना दिया जम के एक व्यक्ति को ,  वही का कार्यकर्ता रहा होगा , वहां की बाजार घूमते हुए पहुचे चांदनी चौक बहुत बड़ा बाजार है  यहां कपडे वगेरा जब न खरीदना हो तो हाथ मत लगाना वरना चढ़ ही जायेगा दुकानदार , हमारे साथ हो चुकी घटना , बहुत शातिर है यहां दुकानदार , हमने मात्र  जूते खरीदे ,150 रुपये में दीपक ने भी लिए ,  फिर वापस स्टेशन , पता लगाया तो जानकारी लगी कि , एक ट्रेन अभी अभी  निकल गई , अब थोड़ा लेट है । जैसे तैसे  मथुरा हम पहुचे करीब 11 बजे , जाना है बृन्दावन पर रात को टेम्पो वालों के रेट आसमान छूने लगते है , लगते 7 रुपये से 10 रुपये है पर रात को 8 के बाद 150 , 200 , ऐसी बात करते है ,  उसका कारण भी है , वापसी की सवारी मिलेगी नही , हमने तो सुबह चलेंगे यह सोचा ओर हम वही सो गए , सुबह जल्दी उठकर हम वृंदावन पहुचे  रिक्शा पकड़ कर  नानी के घर ग्यान गुदड़ी  मेरी नानी घर पर ही थी (नाना जी रिटायर होकर अपनी जिम्मेदारियों से निवर्त होकर वृंदावन आ गए इस मंदिर को पैसे दे दिए उन्हें रहने के लिए मकान मिल गया ,  ये यहां करीब 30 वर्षो से हैं नाना जी रंग मंदिर में पुजारी थे विगत वर्ष उनकी डेथ हो गई जबलपुर में मामा जी के यहां नानी वापस महि जाना चाहतीं  )हमे देख बहुत खुश हुई और उनकी बोली में लगी डांटने , तुमकों समझ नई आती है लाला इतनी ठंड है और तुम्हे घूमने की पड़ी है काय जाते हो ऐसे मौसम में घुमबे, फिर धीरे से शांत हुई फिर चाय पिलाई हमे ओर लड्डू दिए , नानी ने हमारे लिए खाना रखा हम निकल लिए जमना जी , उस समय अच्छा पानी हुआ करता था , हम नाव से उस पार गए वहां नहाए ओर वापस घर आकर भोजन किया और घूमने निकल गए , पर सब मंदिरों के पट बन्द , अंग्रेज मंदिर भी , तो क्या करें सामने बगीचा सा है हम वही जाकर लेट गए नींद लग गई , थोड़ा आराम करके फिर मंदिर गए , वापसी में बिहारी जी रंग मंदिर आदि फिर रंग मंदिर के अंदर से ही घर आ गए आकर खाना खाया और सो गए , आज  सुबह बहुत कोहरा है नानी ने नहाने नही दी , मेने खुद पराठे बनाये नानी के लिए भी , नास्ता करके बाजार गए दीपक को भगवान की मूर्ती लेना था और मुझे भी कुछ सामान , लेकर हम लाल मंदिर गए ,उसके बाद  फिर हम मदन मामा से मिलने भजनाश्रम गए वे वहा नही थे , फिर पता लगाते उनके घर गए वे खेत चले गए थे , हमे समय हो रहा था तो हम वापस घर आ गए , खाना खाया मंदिर के बाकी लोगो से मिले ओर निकल गए मथुरा के लिए स्टेशन जाकर जयपुर का पता लगाया तो ट्रेन की टाइमिंग गड़बड़ थी , फिर हमने इंदौर निकलने की सोची , ट्रेन को समय है तो हमने रिक्शा किया और सामान साथ लेकर द्वारका धीश मंदिर गए , वहां इस बार भी पट बन्द मिले यह मेरे साथ तीसरी बार हुआ है , स्टेशन में पूरी रात काली हो गई ट्रेन लेट होते होते सुबह 3 -40पर आई अब जगह भी नही ,ओर हम ने पहले ही बताया कि रिजर्वेशन अपन लेते नही थे  , हम सामने विकलांग लोगो के लिए रिजर्व डब्बे के सामने खड़े थे , अंदर लोग थे पर गेट नही खोल रहे थे , एक पुलिस वाले ने मुझसे पूछा साहब कोई परेशानी है  मेने उसे बताया की अंदर लोग है पर दरवाजा नही खोल रहे है, तब उन लोगो ने  दरवाजा खुलवाया सामान भी साथ मे रखवाया , पता नही क्या समझ रहा था हमे वो ? खेर अपना काम तो हो गया , ट्रेन शाम को 5 बजे इंदौर पहुची , मेने अपने घर फोन कर मौसी का पता लिया और उनके घर जा धमके , शाम का खाना मौसी की बड़ी बेटी के घर हुआ , ओर फिर विश्राम , दीपक अपने एक परिचित के घर चला गया था रात वही रुकेगा , 
सुबह जब हम उठे तो बज रहे थे 8  दीपक भाई 10 बजे वापस आ गए हम नहा धोकर राजवाड़ा गए वहां से घूमफिर कर वापस  घर मौसा जी आर्मी में डॉक्टर थे रिटार्यड है  मौसी प्रिंसिपल है स्कूल में , वे भी वापस आ चुकी थी ,  खाना हुआ शाम को हम बस द्वारा उज्जैन आ गए यहां धर्मशाला भरीं हुई है , अतः होटल में कमरा लिया , ओर रात्री विश्राम , 
सुबह जल्दी उठकर नहा धोकर महाकाल मंदिर गए , काफी बड़ा मंदिर है काफी देर रुके वहां पर , वहां ओर भी बहुत से स्थान है घूमने के , 35 रुपये में उज्जैन दर्शन भी कराते है , घूमने की इक्षा तो है पर  वापस भी जाना है , ट्रेन का भी टाइम हो गया हम ट्रेन से भोपाल आ गए  आधा घण्टे बाद पेंचवेळी ट्रेन से  रवाना होकर कल सुबह  छिंदवाड़ा उतरेंगे  , ओर फिर लगभग 10 बजे तक सिवनी । 
सफर तो खत्म हुआ पर आने वाले समय के लिए यात्रा का विषय मिल गया , क्योंकि आप कितना भी घूम लो कुछ न कुछ तोब्रह ही जाता है और वही कारण बनता है पुनः यात्रा का , यह वर्णन यही समाप्त होता है , 
कैसा लगा आप कमेंट्स में जरूर बताएं, आगे फर मिलते है नई यात्रा के साथ , नमस्कार,






    
      नानी जी के साथ तस्वीर उनके पड़ोसी भी साथ है

     नाव से जमना जी पार जातेे हुुयेे


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