कोलकाता - गोवाहाटी - गंगासागर, यात्रा वर्णन भाग - 1
इस यात्रा में वर्णन सिवनी से बर्धवान फिर आसाम कामाख्या माता एवं गोवाहाटी दर्शन
मेने पूर्व यात्रा वर्णन में आपको जानकारी दे दिया था कि घूमने के लिए हमे कोई न कोई बहाना चाहिए सो व्यवसाय ही ऐसा है कि मौके मिलते ही रहते है , 2016 में भारत के सुप्रशिद्ध तबला वादक पं. प्रसन्नजीत पोद्दार जी का आमंत्रण मिला वे वर्धमान में " भारत संस्कृति उत्सव " नाम से ऑल इंडिया लेबल का नृत्य गायन वादन की प्रतियोगिता कराते है , करीब 10 से 12 राज्यो के कलाकार उसमे शामिल होते है , में पहले भी एक बार ग्रुप को लेकर जा चुका हूं , इस बार मात्र घूमने का उद्देश्य है क्योंकि पूरे ग्रुप के साथ बहुत परेशानी होती है इसलिए इस बार निश्चित किया गया कि ज्यादा लोग नही जाएंगे । में - मेरी पत्नी मानसी एक फेमिली फ्रेंड अंजू जो कि मेरी स्टूडेंट आरजू की मम्मी भी है , ओर हमारी दोस्त और स्टूडेंट भी ओर हमारे क्लास की होनहार शिष्या संगीता ठाकुर को लेकर निकल पड़े । 23 दिसम्बर को सुबह निकले जबलपुर फिर जबलपुर से दोपहर 11 - 30 बजे ट्रेन है पर लेट होने की वजह से डेढ़ बजे आई जो कि 24 को सुबह 08 बजे वर्धमान पहुँचती है , हमारा टिकिट कन्फर्म नही था पर वेटिंग उतनी भी नही थी कि टाइम पर कन्फर्म न हो , पर किस्मत खराब अंतिम समय तक भी कन्फर्म नही हुआ , खड़े खड़े बहुत समय गुजर गया साथ मे महिला मंडल तो ओर ज्यादा समस्या , कहते है ऊपर वाला सब देखता है , हमने ट्रेन के सफर में कई बार लोगो को अपनी खाली सीटें दी है , उसी का पुण्य प्रताप की मेरे सामने जो बन्दा खड़ा हुआ था वो मुझे बड़े गौर से देख रहा था , मेने भी गौर किया तो ऐसा लगा कि उसे जनता हु । थोड़ी देर बाद उसने खुद ही पूछ लिया कि भाई आप बजरंगदल में हो क्या ,(में 1994 से 2001 तक बजरंग दल का जिला अध्यक्ष रहा हूँ ) मेने भी तत्काल आवाज सुनते ही अंदाज लगाकर बोला डब्ल्यू भाई , बोला हां हमारा आश्चर्य दोगुना की जिस व्यक्ति को हमारे शहर के लोग समझते है कि ये व्यक्ति जिंदा नही है वो साक्षात मेरे सामने है , वो भी बहुत खुश हुए बातचीत चलने लगी कि सारे कर्मो को छोड़ वाकई मरने की सोच निकला था पर शिरडी पहुचा तो वहां एक आश्रम में रुका वही मन लग गया अब समाजसेवा के कार्यो में आश्रम के साथ हु जीवन भर , पहले से बेहतर हु , उसने बताया कि वो भी कलकत्ता जा रहे है ,उन्होंने हमारी परेशानी जान कर दो सीट तत्काल दी , जो उनकी ही थी शायद बन्दे नही आ पाए होंगे इसलिए खाली थी , एक सीट पर श्रीमती जी और संगीता एवं एक सीट पर अंजू फिर सोने के समय भी मेरे लिए एक बर्थ की व्यवस्था और की, कभी कभी ट्रेन में बड़ी महेंद्र घटनाएं होती है , अंजू शुद्ध शाकाहारी जीव है ऊपर बर्थ में सो रहीं थी और नीचे अंडा बिरयानी अंडा रोल लेकर बेचने वाले भाई साहब बार बार उन्ही की सीट के पास आकर खड़े हो जाएं और आवाज मारें उस समय अंजू का चेहरा देखने लायक रहता था , रात्री इत्मीनान से कट गई और हमारा स्टेशन भी आ गया , खैर डब्ल्यू भाई को धन्यवाद दिया और हम उतर गए वर्धमान , आयोजन स्थल पहुच एंट्री कराई , रूम मिल गया , हम सब ने स्नान ध्यान कर भोजन किया आराम कर शाम को कार्यक्रम देखा और सो गए , दूसरे दिन जानकारी मिली कि दोपहर बाद प्रस्तुति होगी , पर प्रतिभागी अधिक थे शाम हो गई थी संगीता का नृत्यांकन बहुत ही अच्छा रहा , आज का दिन यानी 25 भी यही बीत गया , हमारा 26 का रिजर्वेशन था शाम का गोवाहाटी के लिए इसलिए दिन में लोकल वर्दमान घूमे यहां एक बड़ा मंदिर है जिसे 108 महादेव कहते है । स्टेशन से 108 शिव मंदिर समूह की दूरी कुल चार किमी० है । वहा से आप रिक्शा करके मंदिर तक जा सकते है । वैसे हम लोग आयोजन स्थल कर्जन गेट से लोकल बस से 108 शिव मन्दिर समूह तक गये थे ।इस जगह का मुख्य आकर्षण है एक जगह पर भगवान शिव के 108 मंदिर होना । 108 शिव मंदिर का निर्माण राजा तिलक चंद जी की विधवा रानी विष्णु कुमारी ने सन् 1784 में शुरू कराया । उस समय देश में अंग्रेजी शासन था । सम्भवतः रानी के अंग्रेजो के समक्ष न झुकने के कारण , अंग्रेजो ने यहाँ स्थित नवाब हॉट को तहस नहस कर दिया था । रानी कई दिनों तक परेशान रही थी । एक रात अचानक से भगवान शिव उनके सपने में आये और उन्हें इसी स्थल पर 108 मंदिर बनाने के लिए प्रेरित किया । मंदिर को पूरा करने में चार साल लग गए , और ये मंदिर श्रंखला सन 1788 में बन कर तैयार हुआ । मंदिर के बाहरी वृत भाग में 74 मंदिर और अंदरूनी भाग में 34 मंदिर है । ये सभी मंदिर झोपडी नुमा आकार में बने हुए है, और सारे के सारे एक जैसे ही आकृति के है । ये मंदिर के चारो दिशाओ में बने हुए है । बाकि 107 में तो भगवान शिव लिंग के दर्शन होते है, सिर्फ एक में शिव लिंग के साथ पार्वती माता के भी दर्शन साथ -साथ होते है । जहा 54 मंदिर पूरे होते है, वहा जोड़े से सफेद और काले रंग के नंदी जी के दर्शन होते है । मंदिर तो में पहले एक बार ओर आ चुका हूं या बार थोड़ा इत्मीनान से देखा और समझा फिर हम मंदिर से घूमते हुए वापस रूम आ गए , आकर अपने बेग उठाकर स्टेशन पहुच गए शाम को ट्रेन है जो कि लेट हो गई है , इस समय मे किसी भी क्षेत्र में जाइये कोहरे के कारण ट्रेन लेट ही चलती हैं , अब गोवाहाटी पहुचने भी लेट होगा और ज्यादा नही घूम पाएंगे जबकि बिल्कुल सुबह सुबह पहुचने का प्लान था !हुआ भी वही हम दूसरे दिन शाम लगभग 04 बजे गोवाहाटी पहुचे होटल बहुत है पलटन बाजार में हमने थ्री बेड रूम ले लिया ज्यादा महंगा नही है पूरा प्लान लेट होने के कारण गड़बड़ हो गया है हम जल्दी ही स्नान कर के माता कामाख्या के दर्शन को , निकल पड़े चौक से ही लोकल बस पकड़ी जो कामाख्या मंदिर के पास तक गई वहां से टैक्सी में बैठकर मंदिर तक गए लोग बता रहे थे कि बहुत लंबी लाइन है क्या पता दर्शन होते है कि नही सुबह सुबह आना पड़ेगा , हम भी यही सोच रहे थे कि दर्शन अभी हो जाएं तो बहुत अच्छा रहेगा खैर लेट तो बहुत हुए लाइन भी लम्बी थी पर दर्शन हो गए , मंदिर की शोभा अद्वतीय है यह मंदिर गोवहाटी से मात्र 08 किलोमीटर दूरी पर है देवी के 51 शक्ति पीठों में यह पीठ है बताया जाता है सती के शरीर के 51 टुकड़े जो पृथ्वी के अलग-अलग भागों में जाकर गिरे। इन्हीं में से सती का योनि भाग यहां गिरा था। यहां पर मंदिर में चट्टान के बीच बनी आकृति देवी की योनि को दर्शाता है। जिसके पास में एक झरना मौजूद है। योनि भाग से जल धार हल्की बहती रहती है। श्रद्धालुओं की मानें तो इस जल का पान करने से हर प्रकार के रोग एवं बीमारी दूर होती है।
कामाख्या देवी मंदिर पर हर वर्ष अम्बुबाची मेला लगता है। इस दौरान यहां का पानी लाल पड़ जाता है। पानी का लाल होना कामाख्या देवी के मासिक धर्म के कारण होना बताया जाता है। इसलिए तीन दिन तक मंदिर के पट (द्वार) बंद कर दिए जाते है। इन तीन दिनों के बाद द्वार खोल जाते है तो यहां लाखों की तादात में भक्त दर्शन करने पहुंचते है। देवी के मासिक धर्म से गिले हुए वस्त्रों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है। इस गीले कपड़े को अम्बुबाची कहते है। इसलिए मेले का नाम भी अम्बुबाची दिया गया है। हमे दर्शनों के लिए लम्बा घूम कर जाना पड़ा ,पर दर्शन अच्छे से हो गए । समय की बहुत कीमत होती है जब आप कही बाहर घूमने जाते है , आज ट्रेन समय पर आ गई होती तो कुछ और भी प्लान किया जा सकता था मेने गोवाहाटी पहुचते ही शिलांग जाने का सोचा था और दूसरे दिन सुबह जल्दी वसपस आकर कामाख्या माता दर्शन कर शाम को लौटने का प्लान था , खैर मंदिर से निकल हम वापस अपने होटल आ गए खाना खाया ,मार्केट घुमा अब महिला मंडल साथ था तो मार्केटिंग तो तय है ,। फिर हमने भी एक लेदर जैकेट ले लिए श्रीमती जी ने आसामी ड्रेस "मेखला" सेट लिए मेखला एक आसामी संस्कृति का विशेष परिधान है , ज्यादा मेंहगे भी नही अलग अलग किस्म के अलग अलग रेट , संगीता ने मां के लिए साड़ी अंजू ने भी कुल मिलाकर सभी ने जम के खरीददारी की , फिर वापस होटल , अब ज्यादा समय बचा नही था पास क्योंकि कल 5 बजे वापसी का रिजर्वेशन कर रखा था तो लोकल ही घूमने का प्लान बनाकर सो गए ,
28 को सुबह आराम से उठकर तैयार होकर निकले बाहर आकर चाय नास्ता किया फिर रेलवे स्टेशन के उस पार ब्रम्हपुत्र नदी पर गए , वहां स्टीमर चलते है अभी उनका समय हुआ नही था हम वही टहलते रहे फिर एक मोटर बोट में बैठकर बीच मे बने एक टापू पर गए वहां एक सुंदर मंदिर है वहा उमानन्दा मंदिर है यह मंदिर ब्रम्हापुत्र नदी के पीकॉक टापू पर है
उमानंद मंदिर अपनी वास्तुश्ल्पिीय विशेषता के लिए जाना जाता है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर का निर्माण अहोम राजा गदाधर सिंह के शासन काल में बार पुकान गढ़गन्य हंदीक्यू ने किया था। यहां हर साल फरवरी के महीने में पड़ने वाली शिवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालू आते हैं। मंदिर तो अपने आप में खूबसूरत है ही, पर मंदिर के चारों ओर बहने वाले ब्रह्मपुत्र का नजारा मंत्रमुग्ध कर देने वाला होता है। यहां मात्र बोट अथवा स्टीमर से ही जाया जा सकता है सुंदर नजारे ओर बोटिंग का आनन्द लेते हुए काफी समय बीत गया वहां से वापस आकर होटल से सामान उठाया और पहुच गए स्टेशन शाम को समय पर ट्रेन थी 5 बजे , हमने खाना लेकर रख लिया था जिसे ट्रेन में ही खाया और फिर नींद के आगोश में आगे कोलकाता और गंगासागर यात्रा के साथ मिलते है अगले अंक में अब तक के लिए प्रणाम .......
चित्र श्रृंखला
108 महादेव मंदिर वर्दमान
कार्यक्रम स्थल
हमारी शिष्या संगीता अपनी कत्थक प्रस्तुति देते हुए
वर्धमान स्टेशन
कामाख्या माता मंदिर गोवाहाटी
ब्रम्हपुत्र नदी गोवाहाटी
उमानन्दा मंदिर गोवाहाटी
उमानन्दा मंदिर से नीचे बोट नदी पर
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