कोलकाता, गोवाहाटी, गंगासागर यात्रा वर्णन भाग। - 2

पिछली यात्रा में आपको बताया था कि, हम गोवाहाटी से शाम 05 बजे ट्रेन  से निकले और तारीख 29 को उतरना था बर्दवान पर नींद लगी होने से बर्दवान निकल गया हम  सीधे उतर गए हावड़ा ,स्टेशन  में एक लफड़ा हो गया की चेकिंग स्टाफ ने हमे रोका हमने उसे पूरी बात बता दी पर वो नही माना , हमने कहा बर्दवान से हावड़ा की टिकिट के पैसे दे सकते है , वो 3 हजार 2 हजार करते रहे ।  आखिर  हम भी एमपी के है कैसे मान ले उनकी बात हमने अपनी ही मनवाई एक रुपया ऊपर का नही किराए के पैसे बस दिए , भाई हमने जानकर किया नही था , खैर वहां से फ्री होकर चाय पीकर सीधा निकले कोलकाता कोलकाता में कही से भी आपको कागदीप के लिए बस टेक्सी मिल जाएगी , हम जैसे ही फेरी के लिए पहुचे पहुचते ही एक फेरी निकल गई , अब रुकना पड़ेगा हमने टिकिट कटा रखी है , करीब एक घण्टे वहां बेकार हुए वही पर नास्ता वगेरा किया धुंध अत्याधिक है , यहां कीचड़ में वहां के लोकल बच्चे पैसे ढूंढते दिख जाएंगे , जैसे तैसे स्टीमर चला बहुत भीड़ है में आज से पहले कभी भी स्टीमर में नही बैठा हूँ , बैठा क्या हु खड़े होने की जगह मिल गई बहुत है , यह वह स्थान है जहां गंगा नदी बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है यहां गंगा नदी को हुगली नदी भी कहते है , जबरदस्त मनमोहक नजारा दिखाई देता है कुछ तस्वीरें लिया मगर घुन्ध बहुत है , जैसे ही स्टीमर सागर आइसलैंड पहुचा अलग ही रोमांच उतपन्न हो रहा था मन मे क्योंकि कभी सोचा नही था कि गंगासागर आएंगे , बुजुर्गों से सुन रखा था "सारे तीर्थ बार बार - गंगा सागर एक बार " ऐसा क्या है यहां ? क्या समस्या है ? जो ऐसा बोलते है । मगर अभी तक ऐसा कुछ समझ नही आया यहां से मिनी बस में बेठ कर एक गांव तक गए टेक्सी बस यही तक आती है यहां से आगे जाने के लिए  घोड़ा गाड़ी मिली हमारे साथ ओर भी लोग है कुछ बीच मे उतर गए एक बुजुर्ग परिवार है साथ , मेने तो नही नहाया सोनू संगीता ओर अंजू ने स्नान किया ,हमारा  आसपास कि फोटो खींचने में ज्यादा ध्यान रहा वहां नारियल पानी और नारियल मलाई का स्वाद लिया गया , वहां से निकल कर कपिल मुनि के आश्रम गए  वहां दर्शन किये , प्राचीन कथा के अनुसार सगर राजा के काल मे उसके पुण्य से डरकर इंद्र ने षड्यंत्र रचा ओर राजा का अश्व कपिल मुनि के आश्रम में ले जाकर बांध दिया , सगर ने अपने 60000 पुत्रों को अश्व ढूंढने यहां वहां भेजा , अश्व को मुनि के आश्रम में देख उन्होंने मुनि पर आरोप लगाया , कपिल मुनि झूठे आरोप से व्यथित हो गए और  सगर के समस्त पुत्रो को भस्म कर दिया , राजा के निवेदन पर श्राप वापस तो नही हो सकता पर उन पुत्रो के मोक्ष  का रास्ता बताया कि गंगा को धरती पर लाओ  उनके स्पर्श से सभी मोक्ष प्राप्त करेंगे , सगर के वंश में भागीरथ राजा हुए उन्होंने घोर तपस्या कर गंगा को घरती पर लाया । आज कपिल मुनि आश्रम के दर्शन कर खुद को धन्य महसूस किया , वापस स्टीमर से जाना है  पर यहां तो बहुत लंबी लाइन लगी है , आज रात किसी भी हालत में वापस नही हो पाएंगे , वहां जानकारी लिए तब पता लगा भाटा के कारण स्टीमर नही जा पा रहा है पानी बढ़ने की राह देख रहे है , हमने महिला मंडल को  पीछे लाइन में बैठाल कर निरीक्षण करते हुए सबसे सामने , वहां जानकारी लेते लेते साथ वाले अंकल लाइन में घुस कर बेठ गए धीरे से मुझे भी अंदर कर लिया , हम बैठकर वही फल्ली खाते रहे और वहां लोगो से बात करते रहे , ओर घुलमिल गए इतने में अंकल ने बोला कि सब महिलाओं को चायपान के लिए  होटल में बैठा रखा है उन्हें ले आओ, में निकला और सबको वहां ले आया वहां तब तक हलचल बढ़ गई थी  गेट खुल गया था , भीड़ दौड़ पड़ी , अंकल ने टिकिट ले ली थी फर क्या था हम भी सीधे भीड़ में घुस गए हम भी साथ हो लिए हमारे पीछे बेरियर लगा दिया गया , किस्मत हमारी अच्छी की हम निकल गए वहां से , कागदीप में सब सुन सपाट । वहां  बुलट को सामने लगाकर पीछे डाला बनाकर लोगो को बैठाल कर ले जाने वाली गाड़ी खड़ी है , हमने उसे बोला तो बोला यहां से अब कुछ नही मिलेगा बैठे हम सब बेठ गए , गाड़ी चली ही थी कि बस की आवाज आई कंडक्टर आवाज लगा रहा था , मेने गाड़ीवाले से कहा रुकने को वो माना नही ओर तेज भगाने लगा , मेने उसका हाथ पकड़ कर ब्रेक लगाया और उत्तर गए , बस में जगह भी मिल गई और पैसा भी उचित  वो तो डरा कर ज्यादा पैसे ले रहा था ,ओर हमे हावड़ा तक जाना था और यह बस वही तक जा रही है , अंकल तो उतर गए दयानन्द सरस्वती आश्रम में वे वही रुके है वहा कमरे खाली नही थे वरना हम भी रुक जाते , खैर हम स्टेशन पहुचे ओर कुछ देर बाद ट्रेन भी आ गई लगभग 2 बजे हम बर्दवान में अपने रूम में पहुच गए , वो तो अच्छा हुआ कि रूम मैनेजर से व्यवहार बना लिया था तो उसने अपना नम्बर दे दिया था वरना रात को वो गेट नही खोलता , इस प्रकार 29 तारीख का समापन हुआ 30 को ज्यादा कुछ नही आराम किया गया शाम को सर्वमङ्गला मंदिर गए यह मंदिर ज्यादा दूर नही है  सर्बमंगला मंदिर के साथ तारकेश्वर, रामेश्वर, कमलेश्वर, चंदेश्वर और डीएन सरकार रोड स्थित मितेश्वर शिब मंदिर, बर्दवान एक पुरानी धार्मिक संस्था है जिसे महाराजा कीर्तिचंद ने वर्ष 1702 ई। में बनवाया था और तब से यह मंदिर एक पवित्र स्थान बन गया है। बर्दवान के लोगों के साथ-साथ आसपास के जिलों और राज्यों में भी, दर्शनार्थी दर्शन के लिए आते है  इस  प्रतिष्ठित मंदिर और देवता का उतना ही महत्व और लोकप्रियता है, जितनी कालीघाट, दक्षिणेश्वर, तारकेश्वर और तारापीठ का है। रोजाना सैकड़ों भक्त माता सर्व मंगला का आशीर्वाद प्राप्त कर स्वयं को धन्य महसूस करते है   माता सर्वमंगला की मूर्ति  लगभग 1000 वर्ष पुरानी है, पुराने साहित्य और पवित्र पुस्तकों में इसका अस्तित्व है। यह अठारह हाथों वाली माता दुर्गा की मूर्ति है और सिंह महिषी मर्दिनी पर अर्पित की गई है और मंदिर की संरचना टेरा-कोट्टा शैली की कला और वास्तुकला के अद्वितीय सम्मिश्रण और तत्कालीन बंगाल की लोकप्रिय वास्तुकला को दर्शाती है। इतिहासकारों ने मंदिर के ऐतिहासिक महत्व और पुरातन मूल्य को गंभीरता से दर्शाया है। बर्दवान जिले का सर्वमंगला मंदिर मुख्यतः ऐतिहासिक पर्यटन स्थल है। आप कभी वर्धमान जाते है तो इन मंदिरों में जरूर जाएं 
काफी देर हम लोग वहां रुके रहे , फिर मंदिर बन्द होने लगा तो निकल गए मार्केट घूमते हुए वापस होटल में खाना खाया , हां यहां शुद्ध शाकाहारी को बहुत दिक्कत है बहुत ही मुश्किल होगी शुद्ध शाकाहारी खाने की होटल ढूंढने में , चावल ज्यादा चलता है यहां , 
आज 31 है और हमारा लास्ट दिन यहां सुबह सुबह फिर निकल पड़े स्टेशन टिकिट कटाई लोकल ट्रेन से ओर हावड़ा के पहले उतर गए वहां से पैदल पैदल गए वेल्लूर मठ , आज तक सुना बस था हम सब अपनी बोलचाल में कई जगह के नाम बदल देते है हुआ यह कि बेलुड़ गांव में होने के कारण वेलुड मठ कहा जाता है , ओर हम बेल्लूर मठ बोल रहे थे यह वहां जाकर पता लगा  , बेलुड़ मठ हुगली नदी के पश्चिमी तट पर बेलूड़ गांव  में स्थित है। यह रामकृष्ण मिशन और रामकृष्ण मठ का मुख्यालय है।  इसकी स्थापना १८९७ में स्वामी विवेकानन्द ने की थी।
बेलूड़ मठ के मूल मन्दिर में रामकृष्ण परमहंस की संगमरमर की मूर्ति है 
40 एकड़  भूमि पर स्थित इस मठ के परिसर में स्वामी रामकृष्ण परमहंस, शारदा देवी, स्वामी विवेकानंद और स्वामी ब्रह्मानन्द की देहाग्निस्थल पर उनकी समाधियाँ व मन्दिर स्थित है, तथा रामकृष्ण मिशन के प्रमुख कार्यालय बने हुए हैं। तथा, रामकृष्ण मठ व मिशन के इतिहास और विचारधारा को  प्रदर्शित करने हेतु एक संग्रहालय भी यहाँ निर्मित किया गया है। इसके अलावा, बेलुड़ मठ के मुख्य परिसर के निकट, रामकृष्ण मिशन के कुछ शिक्षा संस्थानों के भी परिसर हैं, जिनमें विद्यामंदिर, शिल्पमन्दिर, वेद विद्यालय तथा स्वामी विवेकानंद विश्वविद्यालय के परिसर शामिल हैं। वर्त्तमान समय में, यह मठ भारत के प्रमुख पर्यटनस्थलों में से एक है, तथा स्वामी रामकृष्ण परमहंस, रामकृष्ण मिशन तथा स्वामी विवेकानंद के विश्वभर में फैले श्रद्धालुओं हेतु एक पवित्र तीर्थस्थल के समान महत्व रखता है।हमारे पास समय बहुत नही है  फिर भी काफी देर वहां रुके रहे फिर हम लोग नाव द्वारा दक्षिणेश्वर काली मंदिर के लिए निकले नाव बोट का सफर इस यात्रा के दौरान दूसरी बार हो रही है , काली माता मंदिर में दर्शनों के लिए बहुत लंबी लाइन लगी थी करीब दो घण्टे लग गए दर्शन होने में,दुनिया के सारे कड़े नियम सहन हो जाते है  बस एक बात सहन नही होती और वो यह कि इतने प्रशिद्ध मंदिर में पुजारी अथवा उनके चेलों द्वारा पैसे मांगने की आदत,  यहां पर भी यही हुआ बाबा जी की अच्छे से झकर उतारी गई पूरा मन खराब हो जाता है , पिछले बार काली मंदिर नही आ पाए थे समझ ही नही आ रहा था कि गाड़ी बस कहा से मिलेगी और हम बहुत लेट भी हो गए थे  । खैर दर्शन उपरांत भोजन किया गया फिर  घूमते हुए विक्टोरिया  जाने का प्लान बना ओर निकल लिए  , विक्टोरिया में दूसरी बार जा रहा हु पिछली बार 13 बच्चों के साथ आये थे सबको सम्हालने में अच्छे से कुछ देख नही पाते थे , ओर अभी भी कुछ ज्यादा नही सिख पाए वरना इतने दिन के प्लान में तो गंगटोक दार्जलिंग सिक्किम सब हो जाता , प्लान गड़बड़ बना टाइम खराब ज्यादा हुआ है , कोशिश की जाएगी कि अब ऐसी गलतियां न हो  , विक्टोरिया में तो बहुत भीड़ है टिकिट लाइन भी बहुत लंबी है तिकड़म लगाई गई कुछ बहस भी हुई पर , पर बगेर लाइन के टिकिट प्राप्त कर ली गई , भाई  कभी - कभी ऐसा कर लेना चाहिए , जब आपके पास समय कम हो , 31 दिसम्बर के कारण कुछ आयोजन भी चल रहे थे ऑर्केस्ट्रा भी थी वहां पिछले बार हम अंदर होकर आ चुके है इस कारण इसबार नही गए अंदर कैसा है संगीता ओर अंजू को बता दिए , 
विक्टोरिया मेमोरियल एक ब्रिटिश कालीन स्मारक है। 1906 से 1921 के बीच निर्मित यह स्मारक इंग्लैण्ड की तत्कालीन रानी विक्टोरिया को समर्पित है। इस स्मारक में विविध शिल्पकलाओं का सुंदर मिश्रण है। इसके मुगल शैली के गुंबदों पर सारसेनिक और पुनर्जागरण काल की शैलियों का प्रभाव दिखाई पड़ता है। इस भवन के अंदर एक शानदार संग्रहालय भी है जहाँ रानी के पियानो और स्टडी-डेस्क सहित 3,000 से भी अधिक अन्य वस्तुएँ प्रदर्शित की गई हैं। यह प्रतिदिन मंगलवार से रविवार तक प्रात: दस बजे से सायं साढ़े चार बजे तक खुलता है, सोमवार को यह बंद रहता है।
जनवरी 1901 में रानी विक्टोरिया की मृत्यु पर लॉर्ड कर्जन ने एक स्मारक के निर्माण का सुझाव दिया। लॉर्ड कर्जन ने एक संग्रहालय और उद्यानों के साथ एक भव्य इमारत के निर्माण का प्रस्ताव रखा , वेल्स के राजकुमार, जो बाद में जार्ज पंचम के रूप में सिंहासनारूढ़ हुए, ने 4 जनवरी 1906 को इसका शिलान्यास किया और इसे औपचारिक रूप से 1921 में जनता के लिए खोल दिया गया था  यहां इतनी चहल पहल होती है और नजारा भी इतना मनोरम है कि आने का मन नही करता पर क्या करें  शाम  भी हो चली थी समय पर निकलना सही है,  हम हावड़ा आ गए यहां हावड़ा ब्रिज के साथ फोटो ली गई  कुछ खरीददारी भी हुई  और ट्रेन से वापसी , एक बात और यहां के लोग गुस्सा बहुत जल्दी होते है ट्रेन में सीट मेने पकड़ लिया एक तरफ महिला मंडल को बैठा दिया दूसरी तरफ हम बेठ गए एक व्यक्ति जबरदस्ती महिलाओं के पास बेठ रहा था समझाने पर भी नही माना आखिर हाथ पकड़कर खिंचा तो वो गिर गया वह उसके साथ वाले जो लोकल में डेली सफर करते है वे आ गए और लगे लड़ने , मेरा गला भी बैठा था , भाषा समझ नही आ रही फिर भी खूब समझाया नही माने फिर अंजू ने मोर्चा सम्हाला तब जाकर  महाभारत शांत हुई , महिलाओं की यह पावर गजब की है , कितना भी बड़ा जोधा हो , घिघ्घी बंध ही जाती है , ओर मजे की बात यह कि वो लोग आगे 2 स्टेशन बाद उतर भी गए , में  सोचते रहा कि साले इतने सी दूरी के लिए बहस कर रहे थे , हम तो सिवनी से नागपुर तक खड़े खड़े चले जाते है बस में तक , खैर बर्दवान स्टेशन में आकर ट्रेन का पता लगाया तो ट्रेन लेट है रात को 11 बजे वाली ट्रेन सुबह 09 बजे दिखा रहा है , वापस रूम आये फ्रेस होकर कार्यक्रम स्थल पर गए संगीता को तृतीय पुरुस्कार मिला सीनियर कथक सोलो में , यह हमारे लिए बड़ी उप्लब्धि थी क्यूकी एक से बढ़कर एक कलाकार थे  हमने खुद प्रदर्शन देखा था , गुरु किरोड़ी लाल भट्ट जी ने भी पास बुलाकर बधाई दी , बोले हम समझ गए थे कि ये किसकी शिष्या है ,कार्यक्रम के बाद भोजन किया गया अब ट्रेन सुबह है तो आराम से सोया जाय  , संगीता ओर अंजू ने स्टेशन से केक लिया था 12 बजे न्यू ईयर  वही केक काटकर मनाया , दूसरे दिन 01 जनवरी को सुबह हम उठकर स्टेशन गए पता लगा ट्रेन अभी और लेट है 11 के बाद आएगी , हमने वही से पराठे लेकर रख लिए , रास्ते मे भोजन किया लम्बा सफर है बहुत मुश्किल से कटता है , हम 02 तारीख को सुबह सुबह जबलपुर आ गए , अब हमने कहा कि जब घर ही जाना है तो भेड़ा घाट भी घूम लो , सो सामान लेकर बस पकड़ निकल गए भेड़ा घाट , वहां नर्मदा जी मे खूब नहाया गया , घूम फिर के वापस बस स्टेंड ओर वहां से बस पकड़ कर वापस सिवनी अपने घर । 
इति यात्रा वर्णन समापनम 
नमस्कार प्रणाम अगली यात्रा में फिर मिलेंगे .......कमेंट्स करके जरूर बताएं कैसा लगा वर्णन प्लीज़

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