एक लंबी यात्रा ,अच्छा अनुभव पार्ट - 2
इस अंक में मनाली , मणिकर्ण का यात्रा वर्णन है।
पिछले अंक में मैने आपको बताया था कि निश्चित नही है जाना कहां है जहां मूड हुआ वहीं निकल जाए रहे थे , हो सकता है कि , कुछ रुट बहुत लंबा भी ले लिए हो , ओर कुछ जगह , फिर से घूम कर वही जाना हो जहाँ से आ चुके है , मोबाइल थे नही , जितना लोगो से पता चलता बस उतना ही ज्ञात रहता ,
हां तो मित्रो 13- 1- 2003 हम मनाली तक पहुंच चुके है होटल भी बढ़िया शानदार मिल गई वो भी 90 रुपये में , रात तो बढियां कट गई , सुबह 6 बजे मैनेजर ने फोन किया जरूर था पर हम उठे नही , लेट हो गए करब 09 बजे नहा धोकर कमरे से बाहर निकले , तो रोहतांग के लिए जिप्सी वाले निकल चुके थे अब ज्यादा पैसे लगेंगे , रात को एक ओर मज़ेदाए घटना हुई उसकी याद करते हुए अब हसीं आ रही है , हुआ यह कि , रात को होटल वाले लड़के ने पूछा था कि सर पार्टनर चाहिए क्या ? हमने मना कर दिया ,उसने कुछ और समझ कर बोला , ओर हमने समझ लिए कुछ और , होता यह है कि रोहतांग पास जाने वाले जिप्सी वाले होटल वालो से सेटिंग कर लेते है , 2 सवारी हम ले आएंगे 2 तुम दे देना , ऐसा दो सवारी पार्टनर होती है , जब हमने सुबह होटल से वाहर निकल कर देखने के उद्देश्य से की ये पार्टनर है क्या , बार बार यही रट लगाए है ये लोग , ये होता क्या है , दीपक ने पूछा भाई कहा है पार्टनर दिखाओ, होटल वाला बोलग क्या दिखाओ , सुबह से आपको फोन लगाया कि पार्टनर रेडी है , पर आप आये नही अब वो चले गए रोहतांग , अब कल देखेंगे कोई मिलेगा तो , तब समझ आया और हसीं भी , अब क्या करें ? तब होटल वाले लड़के ने बताया कि , यहां सोलन नाला , है हिडिम्बा मंदिर है वहा घूम लो आप ,हम पैदल पैदल ही हिडिम्बा माता मंदिर निकल गए यह एक प्राचीन गुफा-मन्दिर है जो हिडिम्बी देवी या हिरमा देवी को समर्पित है । जिसका वर्णन महाभारत में भीम की पत्नी के रूप में मिलता है ।
महाभारत में जब पांडव वनवास में थे तब उनका घर जिसे लाक्षागृह के नाम से जानते है जला दिया गया तो विदुर के परामर्श पर वे वहां से भागकर एक दूसरे वन में गए, जहाँ पीली आँखों वाला हिडिंबसुर राक्षस राजा जो महादैत्य वन नामक वन के राक्षसों का राजा था, अपनी बहन हिंडिबा के साथ रहता था। एक दिन हिडिंब ने अपनी बहन हिंडिबा को वन में भोजन की तलाश करने के लिये भेजा परन्तु वहां हिंडिबा ने पाँचों पाण्डवों सहित उनकी माता कुंती को देखा। भीम को देखते ही हिडिम्बा उस पर मोहित हो गई इस कारण इसने उन सबको नहीं मारा यह बात हिडिंब को बहुत बुरी लगी। तब क्रोधित होकर हिडिंब ने पाण्डवों पर हमला किया, इस युद्ध में भीम ने उसे मार डाला जिसके बाद वहाँ जंगल में कुंती की सहमति से हिडिंबा एवं भीम का विवाह हुआ। इन्हें घटोत्कच नामक पुत्र हुआ। यहां इन दोनों माता हिडिम्बा और पुत्र घटोत्कच के मंदिर आज भी हैं।मन्दिर में उकीर्ण एक अभिलेख के अनुसार यह मंदिर का निर्माण राजा बहादुर सिंह ने 1553 ईस्वी में करवाया था । पैगोडा की शैली में निर्मित यह मंदिर सुंदर है । मंदिर के अंदर नीचे हिडिम्बा देवी के पैर का निशान है जो काफी बड़ा है , यह मंदिर तांत्रिक साधना करने वालों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है यह मंदिर देवदार वृक्षो से घिरा है इस मंदिर की खूबसूरती बर्फबारी के बाद देखते ही बनती है । यहां याक वालो ने फोटो खींचने के लिए याक रखे है , हमने भी याक पर बैठकर फोटो खिंचवाई , फिर वापस आकर मार्केट घूमे , अब नींद सी आ रही थी तो होटल जाकर सो गए ,
शाम को उठे फ्रेश होकर घूमने निकल पड़े , मनाली माल रोड शाम को ही गुलजार होती है , आप घण्टो यहां घूम सकते है , बोर नही होंगे , काफी समय हो गया खाना भी खा लिए फिर वापस होटल, सुबह स्नो पॉइंट जाएंगे , ऐसा सोचकर सो गए , सुबह होल वाले ने फोन नही लगाया हम लेट हो गए , नहाना वगेरा करके , उसे बोला तो उसने कहा आपने बताया नही , इसलिए आज पार्टनर तलाश नही किया , खैर हमारा मूड भी चेंज हो गया जब वहां के बारे में पूरा पता लगाया कि रोहतांग में क्या क्या है, हमने एक मारुति वेन वाले से बात की वो सोलनवेळी के एक तरफ के 200 बोल रहा था हमने दोनों तरफ का 300 में सेट कर लिए ओर निकल गए , उसने भी बढ़िया स्पॉट घुमाते हुए ले गया सजलन वेली वाकई जन्नत है , उस समय हल्की बर्फ भी थी , ओर वहां बहने वाली व्यास नही पुरी तरह बर्फ से जमी हुई थी कहि कहि पानी बर्फ के नीचे दिख जाता था, वहां एक शिव मंदिर भी है , प्राकृतिक रूप से यहां बर्फ का शिवलिंग बनता है , जो काफी बड़ा होता है , पहाड़ो पर जमी बर्फ आसपास का नजारा हम तो खो ही गए वहां तस्वीरे ली , नदी के किनारों से स्फटिक भी निकाला , घूमते घूमते समय हो गया , हमे वापस भी निकलना है , अतः मन मारकर वापस आये रास्ते मे हमने स्वेटर भी ली , वापस होटल गए सामान उठाया और बस से निकल पड़े कुल्लू । कुल्लू में तो होटल का किराया ज्यादा था हम जबरन ही आ गए यहां , खैर बाला जी होटल में कमरा मिल गया 70 रुपये में खाना खाया वैष्णो ढाबा में ओर सो गए , सुबह जल्दी ही निकल पड़े मणिकर्ण के लिए बस से सफर बहुत हो रोचक है , बहुत ही खतरनाक खाई वाले रास्ते है , मणिकर्ण एक धार्मिक पर्यटन केंद्र कहे तो उचित होगा , खूबसूरत वादियों के बीच कलकल करती पार्वती नदी का ठंडा पानी और ऊपर 480 सेंटीग्रेट गर्म उबलते हुए पानी के सोते , बीच मे स्वेत रंग का गुरुद्वारा बाजू में शिव मंदिर , पीछे श्री राम मंदिर , मन प्रशन्न हो जाता है , गुरुद्वारे में रुकने की भी पूंर्ण व्यवस्था है , राम मंदिर में भी धर्मशाला है , यहां होटल भी सस्ते है , सुंदर मार्केट भी है, मणिकर्ण की अनेक कहानियां है , इसका नाम प्राचीन चिंतामणी भी कहा जाता है , खेर हमने तो गर्म पानी के एक कुंड में बहुत नहाया यहां ठंडा पानी डाला जाता है कुंड में , आराम किया फिर वहां गुरुद्वारे में भंडारा खाया , पिता जी के लिए जैकेट लिया बहुत अच्छी निकली वह आज तक है हमारे पास , माता जी के लिए शॉल , कुछ लकड़ी के आयटम भी , ओर वापस हो लिए करीब पांच तीस पर वापस आ गए कुल्लू ,
आगे का यात्रा वर्णन अगले अंक में अब तक के लिए नमस्कार ............
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