एक लंबी यात्रा , अच्छा अनुभव। भाग - 3

वैसे इस यात्रा को हम नौ देवी दर्शन यात्रा वर्णन भी कह सकते है पर बहुत से ऐसे स्थानों पर भी यात्रा की गई कि यह शीर्षक उचित नही लगा 
चलिए अब हम ले चलते है आपको इस अंक में  चिंतपूर्णी, नैना देवी, आनन्दपुर साहिब ,ओर अमृतसर की यात्रा में , काफी मित्र कुछ जगह यह सोचेंगे कि भाई गलत रूट पकड़कर चलता है , फलां जगह तो इसके पास थी जबरन घूमकर गया , तो यह बात बिल्कुल सही है कि हमने ऐसा ही किया , जब पहली बार जाओ तो मात्र वे यात्री ही सहारा होते है जो उन जगह घूम कर आ चुके होते है , पर हमारे संपर्क में ऐसा कोई नही था , जिसने जैसा बताया वैसा निकल लिए , तो भाई पिछली यात्रा में हम लौट आये थे मणिकर्ण से , अब जाना है भरवाई यानी हमे जाना है चिंतपूर्णी माता तो जालन्धर बस में बैठकर निकल लिए , रास्ते काफी घुमावदार है , कुछ सवारियां रास्ते भर जगह गन्दी करते रही इस कारण नींद नही लगी , सुबह सुबह 03 बजे बस वाले ने हमे भरवाई छोड़ दिया , वहां काला कुत्ता भर था बाकी कोई नही , ड्राइवर ने बताया था एक दो घण्टे बाद टेक्सी बस चलेंगे उसमे मंदिर तक चले जाना , अब हमें ये भी नही पता कि यहां से कितनी दूर है मंदिर , तो एक दो घण्टे काटने थे वो भी इतनी कड़ाके की ठंड में सड़क किनारे , खैर यह भी मजा है और इस मजे को भी दिल से लिया जाय दिल मे नही । एक दुकान के अहाते में अपनी दरी कम्बल बिछाए ओर आस पास से खड्डे वगेरा इकट्ठा कर आग जलाई , नींद भरपूर आ रही थी तो , वहीं पैर पसार लिए , जब गाड़ी के हॉर्न की आवाज कानो में पड़ी तो देखा  एक छोटी बस थी और समय 5- 30 हो चुके थे झटपट सामान बेग में डाला और बस में बेठ गए , 2 -2 रुपये लिए ओर हमे मंदिर के सामने छोड़ दिया , रात को यही पता रहता तो हम वहां काहे को पड़े रहते  प्रशाद वालो के गेस्टहाउस भी है यही तक आ जाते पैदल ओर यही आराम करते , खैर हम वही फ्रेस हुए , प्रशाद लेकर दर्शन के लिए गए 6 - 30 पर माता रानी के दर्शन किये बहुत ही सुंदर नजारा था और हमारे लिए भी बहुत अच्छा अनुभव , पूरा मंदिर फूलों से सजा हुआ था , थोड़ी देर वही बैठे रहे , 
चिंतपूर्णी गांव जिला ऊना हिमाचल प्रदेश राज्य में स्थित है। चिंतपूर्णी मंदिर सोला सिग्ही श्रेणी की पहाड़ी पर स्थित है। भरवाई गांव जो होशियारपुर-धर्मशिला रोड पर स्थित है वहा से चिंतपूर्णी 3 कि॰मी॰ की दूरी पर है। यह रोड राज्य मार्ग से जुड़ा हुआ है। पर्यटक अपने निजी वाहनो से चिंतपूर्णी बस स्टैण्ड तक जा सकते हैं। बस स्टैण्ड चिंतपूर्णी मंदिर से 1.5 कि॰मी॰ की दूरी पर स्थित है। चढाई का आधा रास्ता सीधा है और उसके बाद का रास्ता सीढीदार पर सीढ़ियां ज्यादा नही है  चिंतपूर्णी धाम  हिंदुओं के प्रमुख धार्मिक स्थलो में से एक है। यह 51 शक्ति पीठो मे से एक है। यहां पर माता सती के चरण गिरे थे। इस स्थान पर प्रकृति का सुंदर नजारा देखने को मिल जाता है। यात्रा मार्ग में काफी सारे मनमोहक दृश्य यात्रियो का मन मोह लेते हैं और उनपर एक अमिट छाप छोड़ देते हैं। वह चीज हम से छूट गई क्योंकि पूरा सफर रात्री में ही हुआ । यहां पर आकर माता के भक्तों को आध्यात्मिक आंनद की प्राप्ति होती है।वर्तमान मे उत्तर भारत की नौ देवियों मे चिंतपूर्णी का पांचवा दर्शन होता है वैष्णो देवी से शुरू होने वाली नौ देवी यात्रा मे माँ चामुण्डा देवी, माँ वज्रेश्वरी देवी, माँ ज्वाला देवी, माँ चिंतपुरणी देवी, माँ नैना देवी, माँ मनसा देवी, माँ कालिका देवी, माँ शाकुम्भरी देवी आदि शामिल हैं मुझे अब समझ आया  कि हम 09 देवी दर्शन यात्रा पर चल रहे है , यहां गर्मी के समय में मंदिर के खुलने का समय सुबह 4 बजे से रात 11 बजे तक है और सर्दियों में सुबह 5 बजे से रात्रि 10 बजे तक का है। दोपहर 12 बजे से 12.30 तक भोग लगाया जाता है और 7.30 से 8.30 तक सांय आरती होती है।  चढाई के रास्ते में काफी सारी दूकाने है जहां से ही श्रद्धालु माता को चढाने का समान खरीदते हैं। मंदिर के मुख्य द्वार पर प्रवेश करते ही सीधे हाथ पर आपको एक पत्थर दिखाई देगा। यह पत्थर माईदास का है। यही वह स्थान है जहां पर माता ने भक्त माईदास को दर्शन दिये थे। भवन के मध्य में माता की गोल आकार की पिण्डी है। जिसके दर्शन भक्त कतारबद्ध होकर करते हैं। श्रद्धालु मंदिर की परिक्रमा करते हैं।   मंदिर के साथ ही में वट का वृक्ष है जहां पर श्रद्धालु कच्ची मोली अपनी मनोकामना की पूर्ति के लिए बांधते हैं। आगे पश्चिम की और बढने पर बड़ का वृक्ष है जिसके अंदर भैरों और गणेश के दर्शन होते हैं। मंदिर का मुख्य द्वार पर सोने की परत चढी हुई है। इस मुख्य द्वार का प्रयोग नवरात्रि के समय में किया जाता है। यदि मौसम साफ हो तो आप यहां से धौलाधर पर्वत श्रेणी को देख सकते हैं। थोड़ी देर बैठने के बाद यहां से विदा लेकर नीचे आकर अपना सामान उठाया , बस स्टैंड पहुचे तो नैना देवी की बस यहां लगी हुई है , पर वह  9-30 पर जाएगी । तब हमने सोचा समय का सदुपयोग किया जाय तो हमने  नागल का टिकिट कटाया , ऊना होते हुए नागल  फिर बस बदल कर भाखड़ा पहुचे ओर बांध में उतर गए , यह बांध  हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर ज़िले में सतलुज नदी पर बनाया गया है। यह बाँध भाखड़ा नांगल परियोजना के अंतर्गत निर्मित किया गया है। इसकी ऊँचाई 740 फीट है।देश की सबसे बड़ी बहुउद्देश्यीय नदी घाटी परियोजना, भाखड़ा नांगल परियोजना को सन 1963 में देश को समर्पित किया गया था। हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर ज़िले में सतलुज नदी पर बना भाखड़ा नागल बाँध देश का सबसे लंबा बाँध है। यह टिहरी बाँध के बाद देश का दूसरा सबसे ऊँचा और दुनिया का तीसरा सबसे ऊँचा बाँध है। इससे बड़ा बोल्डर बाँध अमेरिका में है। यहां परमिशन लेकर पर्यटक घूम भी सकते है , इस के पानी को देखकर आंखे घूम जाती है बहुत ही मनोरम स्थान है , पर क्या करें आगे का सफर भी तो पूंर्ण करना है ।  करीब एक घण्टे में बस भी आ गई , सो हम निकल लिए नैना देवी , यह धाम 9 देवियों में शामिल है , यहां माता के नेत्र गिरे थे , यह स्थान बिलासपुर जिले में शिवालिक पहाड़ियों पर स्थित है नेशनल हाइवे 21 पर स्थित यह स्थान समुद्र तल से 1100 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है ,यहां एक पीपल का पेड़ है जो काफी पुराना है , मंदिर तक पहुचने के लिए करीब डेढ़ किलोमीटर की चढ़ाई करनी पड़ी रास्ते मे प्रशाद की दुकानों के कारण रास्ते की दूरी का पता नही लगता , ऊपर अधिकांश समय धुन्ध छाई होती है यह दृश्य बहुत ही मनोरम दिखाई देता है , यहां एक गुफा भी है कहते है यहां माता विश्राम करती थी , इस गुफा को नैना देवी गुफा कहते है । घूमते हुए बहुत समय हो गया था , वहां से निकल कर हम अमृतसर जाना चाहते थे , पर ड्राइवर ने कहा कि धुंध के कारण बस नही जाएगी , आप आगे आनन्द पुर साहेब  में ही रुक जाओ , आनन्द पुर साहेब नाम मेने एक पुस्तक में पढ़ चुका था , सिख समाज का बहुत पवित्र स्थल है , तो सोचे कि जब ईश्वर मौका दे रहा है खुद ही तो दिक्कत क्या है  हमने भी वही रुकने का विचार किये , आनंदपुर साहिब पहुचकर पहले गए सराय , वहां देखकर दंग रह गए कि इतनी बड़ी भी सराय होती है , किसी बड़े होटल से भी बड़ी ओर साफ सुविधाजनक , वहां पर 50 रुपये जमा करवाया गया सिक्योरिटी के , समय था अभी तो हमने सोचा क्यों न दर्शन कर लिए जाए , कमरे के नल में गर्म पानी भी था तो हमने स्नान भी किया और गुरुद्वारे जाकर दर्शन किया , गुरु तेग बहादुर गुरुद्वारा है यह सिख सम्प्रदाय के महत्वपूर्ण गुरुद्वारों में एक है , सन् 1664 में श्री गुरु तेग बहादुर ने माक्होवाल के प्राचीन क्षेत्र में आनंदपुर साहिब गुरुद्वारा बनवाया था। गुरु गोबिंद सिंह ने इस स्थल पर 25 साल  व्यतीत किये है ।सन् 1936 -1944 में तख्त केसरगढ़ साहिब बनाया गया। स्थानीय लोगों का मानना है कि तख्त साहिब में प्राचीन शस्त्र पाए गए हैं। तख्त साहिब के वास्तुशिल्प में एक बड़ा भवन निर्मित किया है एवं इमारत के सामने एक खूबसूरत वाटिका है।
यहां कीर्तन के उपरांत उन हथियारों के भी दर्शन कराए जाते है जिनसे गुरुओं ने युद्ध किया जो कि यही प्राप्त हुए है  ,रात को गुरुद्वारे की लाइटिंग देखने लायक रहती है , वहां का नजारा ओर शांति मन वहीं बैठे रहने का हो रहा था , कुछ देर वही बैठे भी रहे और फिर वापस कमरे में आकर सो गए । सुबह उठकर स्नान ध्यान किया आनन्द गढ़ का किला देखने गए घुंध बहुत है , । यह किला आनंदपुर साहिब शहर के बीच में स्थित है। दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी ने इलाके में पांच किलों की स्थापना की थी, आनंद गढ़ साहिब उनमें से एक है। यह मुख्य गुरुद्वारा केशगढ़ साहिब से 800 मीटर की दूरी पर स्थित है। गुरु गोबिंद सिंह जी को 1689 से 1705 के बीच मुगलों और पहाड़ के राजाओं से कई युद्ध लड़ने पड़े थे।किला आनंदगढ़ साहिब के अंदर बाउली साहिब को देखा जा सकता है। यह गुरु गोबिंद सिंह जी के समय की है। किला आनंदगढ़ साहिब को बाद में भव्य रुप प्रदान किया गया है। गुरु गोबिंद सिंह ने इसी किले में अपने जीवन के 25 साल गुजारे थे।  केशगढ़, आनंदगढ़, लोहगढ़, होलगढ़ और फतेहगढ़, इन पांच किलों की स्थापना गुरु साहिब ने की थी। इनमें केशगढ़ साहिब अब तख्त बन चुका है। इन पांचो किलों को आपस में जमीन के अंदर बनी सुरंगों से जोड़ा गया था। इन किलों का निर्माण 1689 में शुरू हुआ और इसके निर्माण में दस साल लगे थे। वर्तमान में आनंदगढ़ साहिब को भव्य रुप प्रदान करने का श्रेय संत सेवा सिंह को जाता है। यह काम 1970 में आरंभ हुआ था। इससे पहले 1930 में संत करतार सिंह ने किला नुमा भवन का निर्माण यहां कराया था जिसे अभी भी देखा जा सकता है। काफी देर वहां घूमते रहे म्यूजियम भी देखा  उसके बाद लंगर में भोजन किया ,ओर सामान उठा कर चाबी देने के लिए काउंटर पर गया तो , वहां मैनेजर ने मुझे आवाज देकर बुलाया और बोला कि ये अपने 50 रुपये वापस ले लो , मुझे बहुत आश्चर्य  हुआ , की इतनी अच्छी व्यवस्था है उसके बाद भी कोई पैसे नही ले रहे है । मेने बोला बाबा जी इसे आप ही रख लो उन्होंने मना कर दिया ,  दिल मे ओर भी श्रद्धा बढ़ गई इनकी सेवा के प्रति , हमने बस पकड़ी ओर आ गए अमृतसर , 77 रुपये लगे एक सवारी के ,रात हो गई जब पहुचे बस स्टैंड ,रिक्से वालो का बिल्कुल भरोसा नही वे सीधे आपको किसी होटल में ही ले जाएंगे , क्योंकि उनका कमीशन होता है , हमने सराय पूछा तो सारी भरी हुई है , रात को नही देते , फेमिली होना , ऐसे अन्य बहाने बताते रहा । आखिर हमने बोला की भाई सस्ता होटल दिल दे, तब वो एक होटल ले गया , डेढ़ सौ रुपये में दिया बहुत कम करके, खेर करते भी क्या , रात तो गुजारनी पड़ेगी कैसे भी , जब उस क्षेत्र की कोई जानकारी नही , पहली बार आना हुआ था अमृतसर, इस लिए ठग लिए गए , आज ये स्थिति है कि 09 बार जा चुका हूं अमृतसर , हर बात  की जानकारी है अब ,
मित्रो मुझे लग रहा है वृत्तांत लम्बा हो रहा है , तो इस अंक में बस इतना ही , अगले अंक में जल्द मिलते है सादर प्रणाम .............
इस अंक की तस्वीरें कम है , कुछ खो गईं । रील का भी पता नही जितनी बची है बस यही हैं ।

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