धार्मिक यात्रा हिमाचल की
इस बार जाना तो तय था जाना कहां है वह भी तय था , किन्तु एक बात बिल्कुल सत्य है अगर आप अकेले जाना चाहते है तो आप अपनी मर्जी के मालिक है जैसा चाहे वैसा तय करें , अगर कोई साथ जाता है तो आपकी स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाती है , आपको न चाहते हुए भी वह सब करना होता है जो आप नही चाहते , खैर यात्रा हुए तो एक माह के ऊपर हुआ बस लिखने का सहयोग नही बन रहा था और लग रहा था कि कही और निकल चलें । मेरी बिटिया प्रीत वो 10 साल बाद हुई ,में इससे पहले काफी जगह घूमा हु जहां देव स्थान होते वहां बोल दिया था कि जब सन्तान होगी तो दर्शन के लिए आऊंगा बच्चे को माथा टिकवना है । सो बन गया रूट । अपन ठहरे घुमक्कड़ आदमी मानसी भी कुछ जगह मेरे साथ गई है सो वो भी मेरे तौर तरीके अच्छे से समझती है जानती है और वो भी कम में व्यवस्था बनाना जानती है पर हर व्यक्ति वैसा नही कर पाता तब थोड़ी दिक्कत आ जाती है , हमारे मित्र कम साले साहब विनीष दुबे जी और उनकी पत्नी भी तैयार थे बहुत पहले से उन्हें भी जाना था बस डेट तय नहींकर पा रहे थे और हम जिस समय जाना चाहते थे वो नजदीक आ रहा था हम चाह रहे थे 15 फरवरी पर 19 फरवरी को नर्मदा जयंती पर उन्हें मंडला जाना था । बड़ी जद्दोजहद के बाद तय किया गया 2 फरवरी को निकलना ही है , आखिर लेटलतीफी के चक्कर मे ऐसी में सीट मिली ओर लौटने की भी टुकड़े में , खेर रात को बस से दोनों परिवार जबलपुर की ओर बढ़े बस हमारे मित्र नरेन्द्रनाथ त्रिपाठी की थी , हमने जरा जोर दिया तो उनके कंडक्टर ने तत्काल ही कनशेषन कर दिया , क्योंकि ये जबलपुर तक का किराया बहुत अखरता है ट्रेन अभी सिवनि से डायरेक्ट चलने में समय है । सुबह 6:30 पर ट्रेन है ये मंगलवार को जबलपुर से सीधे श्रीमाता वैष्णोदेवी कटरा तक जाती है , हम पहुच गए 3:30 पर वहां से ऑटो लिया पहुचे स्टेशन ट्रेन 15 मिनिट ओर लेट थी वही आराम किया प्रीत ओर अर्यमा खूब मस्ती करते रहे । दूसरे दिन सुबह बिल्कुल करेक्ट टाइम 3:30पर लुधियाना में उतरे यहां से जाना था हमे आनन्दपुर साहिब महिलामण्डल को वेटिंग में बेठालकर हम आये स्टेशन से बाहर जानकारी ली बस की तो ऑटो वाले तो चढ़े जाते है बसस्टेंड चलो , पर कुछ भलेमानस भी है जिन्होंने बताया कि 4:10 ओर 4:35 पर बस यही आएगी
फैमली बच्चे लाने का अनुभव नही था वो यहां प्राप्त हुआ महिला मंडल उस समय तक आराम कर रहा था जैसे ही हमने समय बताया उसके बाद वे सक्रिय हुई बजा दिए साढ़े 5
अब बताइए कहा से बस मिल जाएगी सामने । गए ऑटो करके 100 रुपये में वहां से आनन्दपुर की सीधी बस मिल गई , किराया बहुत बढ़ गया है बस का एमपी में उसके मुकाबले अभी भी कम ही है । 170 के हिसाब से लिया , बस स्टैंड में चाय नास्ता कर लिया था तो हमने बस में नींद मार ली । आनन्दपुर साहिब में पहले भी 2 बार जा चुका हूं , अभी बस थोड़ा आगे लगा दिया काफी घूम कर जाना पड़ा धर्मशाला तक अब वहां पैसे भी लगने लगे है 100 रुपये पहले नही लगते थे , हम सुबह साढ़े नो बजे पहुच गए थे और काउंटर में बोल रहे कि भाई 12 बजे के बाद रुकने पर 100 ही लगेंगे
ओर अभी लोगे तो आज का भी लगेगा हमने कहा ओके लगें 200 यहां बैठने से अच्छा है नहा धो लेंगे , रूम तो बढ़िया है , सामने ही गुरुद्वारा है ,आनन्दपुर साहिब की स्थापना सिखों के नवें गुरू गुरु तेग बहादुर सिंह ने १६६५ में की। यह पंजाब और हिमाचल की सीमा में है भारत में सिख धर्म के लोग में यह गुरुद्वारा जागृत है। मान्यता है कि इस गुरुद्वारे में मत्था टेकने वाले श्रद्धालुओं की मुराद पूरी होती है। यह गुरुद्वारा पंजाब के उत्तर-दक्षिण क्षेत्र में चंडीगढ़ से 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
सन् 1664 में श्री गुरु तेग बहादुर ने माक्होवाल के प्राचीन क्षेत्र में आनंदपुर साहिब गुरुद्वारा बनवाया था। गुरु गोबिंद सिंह ने इस स्थल पर 25 साल आनंदपुर में व्यतीत किया है ।सन् 1936 -1944 में तख्त केसरगढ़ साहिब बनाया गया। स्थानीय लोगों का मानना है कि तख्त साहिब में प्राचीन शस्त्र पाए गए हैं। तख्त साहिब के वास्तुशिल्प में एक बड़ा भवन निर्मित किया है एवं इमारत के सामने एक खूबसूरत वाटिका है।
हम तैयार होकर गुरुद्वारा गए दर्शन किया फिर लंगर में प्रशाद ग्रहण किया और निकले नैना देवी के लिए , एक सरदार जी आये उन्होंने योजना बताई ,हमारा मन था इस बार नैना देवी मंदिर रोप वे से जाएंगे पर सरदार जी ने सब कबाड़ा कर दिया , ऊपर मंदिर तक छोड़ने लाने के 800 दे देना बोले , बहुमत इसी तरफ था , तो हमने भी हा बोल दी । भाईसाहब गजब का सन्योग है कि जब जब आये है यहां दरबार मे बूंदाबांदी हमेशा मिली है , इस बार तो जोर के आ गया , यहां सीढ़ी चढ़ना बहुत अखरता है
ऊपर तक छोड़ने के बाद भी कुछ दूर सीढ़ी से ही जाना ही पड़ता है । वहा पहुचकर हमने ढूंढा नाई क्योंकि प्रीत का मुंडन यहीं कराने का मन मे पक्का विचार किये थे , अब नाई को अलग कमरा दे दिया गया है वहा प्रीत का मुंडन कार्यक्रम हुआ बिल्कुल भी नही रोइ अच्छे से बाल कटवा लिए वरना आनन्दपुर साहिब में तो हलाकान कर दिया था रो रो कर पता नही क्यों , दर्शन करके नीचे आये चाय पी ओर सरदार जी की ओमनी से वापस आनंदपुर कमरे में आराम किया शाम को विनीष बोले कि मानसी का जन्मदिन है कुछ पार्टी हो जाय बाहर, तो हमने कहा ओके चलो हमे पता है यहां कितने की टिप सकती है इसलिए तत्काल डन कर दिया आखिर भाईसाहब ढूंढ ढाँढ के थकने के बाद बोले ,छोले भटूरे खाते है , छोले भटूरे खाये गए स्वादिस्ट ओर सस्ते सभी लोग मिलाकर हम 200 में ही निपटे ।
दूसरे दिन 4 फरवरी निकलना है यहां से विनीष भाई का मन आगे पीछे हो रहा है , जाए कि नही हमारा प्लान मणिकर्ण ओर मनाली का है हॉ नही हां नही करते करते सो गए सुबह सामान सहित पहुचे चौक में वहां किया बस का इंतजार , हमारे मित्र है नालागढ़ में हरमीत सिंह मीत उन्होंने बताया था कि अगर जाने का प्रोग्राम बने आगे तो कीरत पुर से गाड़ी पकड़ना डायरेक्ट मिलेगी , ओर वापस का जो तो असनन्दपुर से ही मिल जाएगी ।
हम बस से किरतपुर गए वहां डायरेक्ट बस कुछ देर बाद मिल गई , 490 रुपये एक के लिया मणिकर्ण के बहुत किराया बढ़ गया भाईसाहब , अभी बस ही बस में बहुत घूमना था , दिमाग मे गुस्सा आया पर क्या करें , रेट बढ़ गए है तो देना तो पड़ेगा ही , अब खुद के वाहन से बहुत बढ़िया रहेगा आना- जाना । आज का मणिकर्ण तक का यह सफर बहुत लंबा होने वाला था में तो जानता था मगर विनीष ओर एकता नही । धीरे धीरे उन्हें भी समझ आने लगा और उनके चेहरे और दिमाग की उकताहट को में समझ रहा था , मंडी क्रॉस करने के बाद जाम में फसना तय था वही हुआ क्योंकि सड़क का काम चल रहा है । और मौसम ने भी करवट ली बारिश शुरू मौसम खतरनाक हुआ जा रहा था , भुंतर में मणिकर्ण के लिए ड्राइवर कंडक्टर ओर हम चार ओर दो बच्चे बस । घाटियां घटाएं इर काली रात बादलों की गड़गड़ाहट बन्द हुई तो बर्फ गिरना चालू , मुझे तो मानो मन की मुराद पूरी हुई , मगर विनीष ओर एकता डर गए ,ऐसे मौसम के लिए लोग तरस्ते है गिरती बर्फ को देखना महसूस करना कितना आनन्ददायी होता है , मणिकर्ण गरुद्वारे में बस रुकी हमने समान उतारा गरुद्वारे में हमे ऊपर कमर मिला सामान ज्यादा हो गया बहुत तकलीफदेह हो रहा था पूरे सुहाने मौसम के आनन्द की ऐसी तैसी कर रहा था जैसे तैसे कमरे तक गए ,
मनाली की वादियों के बीच बसा मणिकर्ण साहिब गुरुद्वारा किसी चमत्कारी तीर्थस्थल से कम नहीं है। आप इस बात को जान कर हैरत में पड़ जाएंगे कि इस गुरुद्वारे का पानी बर्फीली ठण्ड में भी पानी उबलता रहता है। मान्यता है कि शेषनाग के गुस्से के कारण यह पानी उबल रहा है।
इस गुरूद्वारे में देश-विदेश हर जगह से लोग आते हैं। यहां मौजूद गंधकयुक्त गर्म पानी में जो कोई कुछ दिन तक स्नान कर ले, उसकी बीमारियां ठीक हो जाती हैं। कहा जाता है कि यह पहली जगह है जहां गुरू नानक देव जी ने ध्यान लगाया था और बड़े-बड़े चमत्कार किये थे। जमीन से इस गुरूद्वारे की ऊंचाई 1760 मीटर है और कुल्लू से यह 45 किलोमीटर की दूरी पर है। आपको जानकार हैरानी होगी कि इस गुरुद्वारे में एक साथ लगभग 4000 लोग रुक सकते हैं।
बताया जाता है कि शेषनाग ने भगवान शिव के क्रोध से बचने के लिये यहां एक मणि फेंकी थी , जिस वजह से यह चमत्कार हुआ था। ऐसा क्यूं हुआ इसके पीछे भी कहानी है, बताया जाता है कि 11 हजार वषों पहले भगवान शिव और माता पार्वती ने यहां पर तपस्या की थी। मां पार्वती जब नहा रही थीं, तब उनके कानों की बाली में से एक नग पानी में जा गिरा। फिर भगवान शिव ने अपने गणों से इस मणि को ढूंढने को कहा लेकिन वह नहीं मिल सका। इतने में भगवान शिव नाराज हो गए और उन्होंने अपनी तीसरा नेत्र खोल दिया, जिससे नैनादेवी नामक शक्ति पैदा हुई। नैना देवी ने शिव को बताया कि उनकी मणि शेषनाग के पास है। शेषनाग ने मणि को देवताओं की प्रार्थना करने पर वापस कर दिया, लेकिन वे इतने नाराज हुए कि उन्होंने जोर की फुंकार भरी जिससे इस जगह पर गर्म जल की धारा फूटने लगी। तभी से इस जगह का नाम मणिकर्ण पड़ गया
वैज्ञानिकों का मानना है कि यहां रेडियम है गुरूद्वारे में जो लंगर बनता है वह भी इसी खौलते पानी से तैयार किया जाता है। कई श्रद्धालू इस पानी को पीते हैं और इसमें डुबकी लगा लगा कर अपनी बीमारी को ठीक करते हैं। माना जाता है कि यहां पर नहाने से आप मोक्ष की प्राप्ती कर सकते हैं।
हम फ्रेश होकर नीचे आये दर्शन उपरांत भोजन ग्रहण किया , बर्फ बन्द हो गई थी । मतलब कल मौसम जबरदस्त सुहाना होने वाला था ,
सुबह हुई हमने तो आज यही रुकना था घूमना था कसोल जाने का प्लान था मगर पूरा दिमाग खराब हो गया , सारे प्लान की हवा निकल गई , इन लोगो ने मना कर दिए कि अब आगे नही जाएंगे , बच्चों का डर बताया गया , मन मे सोचा मेने की बच्चे तो ठीक है इनकी ही जान सूखने लगी , खैर मेने भी बोल दिया जैसा सब चाहे वैसा करेंगे , दिन भर वही रहे शाम को भी घूमे , कसोल के बारे में जानकारी जरूर देता हूं
पार्वती नदी के किनारे को पार्वती घाटी के नाम से जाना जाता है। यह घाटी टूरिस्ट्स के बीच एडवेंचर के लिए प्रशिद्ध है पहाड़ नदी ट्रेकिंग इन सब का आनन्द आप एक ही जगह ले सकते है कसोल में
जी हां,एक ऐसा ही गांव है कसोल, जोकि पार्वती नदी के किनारे बसा हुआ है। कसोल पहले टूरिस्ट्स के बीच ज्यादा प्रसिद्ध नहीं था, लेकिन अब यह छोटा सा हिल स्टेशन भी टूरिस्ट्स के बीच खासा पॉपुलर होता जा रहा है।
पार्वती नदी के किनारे बसा हुआ गांव कसोल कुल्लू से महज 40 किलो-मीटर की दूरी पर स्थित है।कसोल गांव एडवेंचर प्रेमियों के लिए बेहद खास है, क्योंकि वे यहां आराम से प्रकृति की गोद मे तारो की छांव का आनन्द ले सकते हैं।
गांव कसोल हिमाचल प्रदेश के और हिल स्टेशन की तरह ज्यादा लोकप्रिय नही है जिस कारण आपको यहां टूरिस्ट्स की भीड़भाड़ भी काफी कम मिलेगी।यहां आने वाले पर्यटकों में सबसे ज्यादा इजरायली हर इस कारण इसे मिनी इजराइल भी कहा जाता है पार्वती नदी यहां ज्यादा गहराई में नही है इस कारण लोग नदी किनारे फोटोग्राफी का आनन्द लेते है
कसोल में घूमने के लिए काफी जगह है जैसे-पार्वती नदी, खीर गंगा चोटी, मलाना, तोष गांव, है। खैर हम यह सब न देख सके पर मणिकर्ण में ही श्री रघुनाथ मंदिर , शिव मंदिर , नैना भगवती मंदिर , ओर मार्केट घूमे , वहां लोकल निवासियों की ड्रेस में फोटो भी खिंचवाई रात्री वही रुक कर ,
दूसरे दिन 6 फरवरी को वापस बैजनाथ आ गए शाम हो गई थी , बैजनाथ में कमरा ले लिया 400 के हिसाब से 2 रूम मिल गए , टेक्सी वाले से बात भी हो गई , सुबह सिमसा जाने की , रात वही बस स्टैंड की होटल में भोजन किया अच्छा भोजन है थाली दी उन्होंने 60 में अच्छा था स्वादिस्ट । सुबह उठते उठाते 8 बजे निकल सके सिमसा माता मंदिर के लिए ,
मंदिर पहुच दर्शन किये श्रद्धा अनुसार दान भी किन्तु वहां पँडित ने दिमाग खराब कर दिया ,
किस्सा यू हुआ कि में ओर मानसी 17 में आये थे यहां हमे नियम नही पता । हम तो मात्र श्रद्धा से आये थे जैसी जानकारी लगी कि यहां रात सोने से महिलाएं गर्भवती हो जाती है उन्हें स्वप्न दिखता है ।
हम भी आये रात रुके मंदिर अच्छा श्रद्धा भी बढ़िया मनोकामना भी पूंर्ण होती है । पर जो वहां पँडित लोग है वो पूरे लुटेरे है परेशान लोगो की भावनाओ के साथ खिलवाड़ कर पैसे कमाते है । किसी न किसी बहाने लोगो को 4 दिन 6 दिन से रोक रखे थे में तो मानसी को दूसरे दिन ही मनाली जाने को बोला पर उसने बताया कि स्वप्न दिखा है । पँडित के पास गए तो वे बोले सन्तान को लेकर आना यहां हमने कहा बिल्कुल आएंगे । हम लोकडाउन के कारण नही आ पाए अभी गए तो बोले लड़की हुई है तो बकरी चढ़ाओ , मेने बोला हमारे कुल में यह नही चढ़ता देवी को । बोले पेसे दे दो 5000 मेने बोला की दान पेटी में डाल दिया हु ओर ट्रस्ट के नम्बर दीजिए उसमें डाल दूंगा इक्षा होगी तो । बोले नही हमारे अकाउंट में डाल देना , बहुत बदमाश है सारे देवी माता के नाम से रहे है लोगो की आस्था के साथ । खैर हम पीछा छुड़ाकर माता को नमन कर वापस हुए वहां से । वापस आकर बैजनाथ मंदिर के दर्शन किये हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा ज़िले में शानदार पहाड़ी स्थल पालमपुर में स्थित है। 1204 ई. में दो क्षेत्रीय व्यापारियों 'अहुक' और 'मन्युक' द्वारा स्थापित बैजनाथ मंदिर पालमपुर का एक प्रमुख आकर्षण है और यह शहर से 16 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर की स्थापना के बाद से लगातार इसका निर्माण हो रहा है।यह प्रसिद्ध शिव मंदिर पालमपुर के 'चामुंडा देवी मंदिर' से 22 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। बैजनाथ शिव मंदिर दूर-दूर से आने वाले लोगों की धार्मिक आस्था के लिए महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यह मंदिर वर्ष भर पूरे भारत से आने वाले भक्तों, विदेशी पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों की एक बड़ी संख्या को आकर्षित करता हैनिर्माण काल तैरहवीं शताब्दी में बने शिव मंदिर बैजनाथ अर्थात् 'वैद्य+नाथ', जिसका अर्थ है- 'चिकित्सा अथवा ओषधियों का स्वामी', को 'वैद्य+नाथ' भी कहा जाता है। मंदिर पठानकोट-मंडी राष्ट्रीय राजमार्ग के बिलकुल पास ही स्थित है। इसका पुराना नाम 'कीरग्राम' था, परन्तु समय के साथ यह मंदिर के नाम से प्रसिद्ध होता गया और ग्राम का नाम 'बैजनाथ' पड़ गया। मंदिर के उत्तर-पश्चिम छोर पर बिनवा नदी बहती है, जो की आगे चल कर ब्यास नदी में मिलती है।दर्शन उपरांत होटल से सामान उठाया और बस स्टेंड आ गए बस स्टैंड होटल के पीछे ही है वहा होटल में भोजन किया प्रीत ने यहां भी रोना शुरू कर दिया सम्भवतः घर से दूर आने पर उसे अच्छा नही लग रहा इस कारण , बस करीब दो बजे मिली शाम को 5से 6 बजे तक हम पहुच गए चामुंडा मंदिर , पहले प्लान था दर्शन कर धर्मशाला जाकर वहां रुकने का यहां शाम हो जाने पर यही रुकने का विचार किया पर यहां सारी धर्मशाला टूट गई है नया निर्माण हो रहा है । वहां एक गेस्टहाउस भी है 400 में कमरा दे दिया वही रुकने का विचार है
आगे अगले अंक में
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